रंगारंग पारंपरिक दशाई झंडा जतरा खूंटी के राई गांव में संपन्न

खूँटी :  के राई गांव में रंगारंग पारंपरिक दशाई झंडा जतरा का आयोजन किया गया। जतरा में अतिथि यों का पारंपरिक सामूहिक गीतों के साथ स्वागत किया गया। बच्चों के लिए आकर्षक झूलों की भी व्यवस्था की गई थी।  झंडा जतरा में बतौर मुख्य अतिथि स्थानीय विधायक रामसूर्या मुंडा, मुखिया अनिमा कच्छप, समाजसेवी यासीन अंसारी, पढ़हा राजा जेवियर सांगा एवं पंचायत के ग्रामीण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।  दशाई झंडा जतरा में अलग अलग गांव टोलों के समूह ढोल नगाड़ों के साथ पारंपरिक नृत्य करते नजर आये। सफेद और लाल पाड़ साड़ी में ग्रामीणों के पारंपरिक नृत्य अपनी समृद्ध परंपरा को जीवंत बना रहे थे। क्या बच्चे, क्या युवा, महिला पुरुष सभी एक लय एक ताल में मुंडारी, नागपुरी और हिंदी गीतों को गाकर पूरे उत्साह के साथ एकजुट नजर आये। राई गांव के पढ़हा राजा जेवियर सांगा ने कहा कि राईगांव में हर साल की तरह इस बार भी दशाई झण्डा जतरा का आयोजन किया गया। इस व्यवस्था को बचाए रखने के लिए हर गांव में कुछ न कुछ कार्यक्रम आयोजन होते रहता है।"

उन्होंने इस जतरा की सबसे खास परंपरा के बारे में बताते हुए कहा  "इस झण्डा जतरा में विशेष करके इस गांव के जितने भी भाई-बहन, माता-पिता, जो दूसरे गांव में विदाई हो गए हैं, इस उपलक्ष्य में सबको इस गांव में निमंत्रण दिया जाता है, न्योता दिया जाता है। ये अधिकांश परंपरा से ये कार्यक्रम चल कर आया है। आदिवासी संस्कृति को बचाकर रखना आज की सबसे बड़ी जरूरत - यासीन अंसारी कार्यक्रम में शामिल समाजसेवी यासीन अंसारी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन आज के आधुनिक दौर में बेहद जरूरी हैं।उन्होंने कहा - "जब इस तरह का प्रोग्राम देखने को मिलता है तो हकीकत में ये समझ में आता है कि आदिवासियों की संस्कृति में कुछ झलक है जो आज की परिस्थिति में बचा के रखना चाहिए। हम लोग आधुनिक दौर में जी रहे हैं लेकिन इस तरह के प्रोग्राम में जो एक धर्म से जुड़ा हुआ, संस्कृति से जुड़ा हुआ जो आदिवासियों की परंपरा है, अगर इसको एक झलक देखते हैं तो अंदर दिल से एक एहसास होता है।"

उन्होंने आदिवासियों के लिबास, रहन-सहन और उनकी गतिविधियों की तारीफ करते हुए कहा कि ये सब चीजें इस समाज की संस्कृति और सभ्यता को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी संस्कृति का हम स्वागत करते हैं और इसे बचा कर रखना चाहिए।

पारंपरिक दशई झण्डा जतरा राई में झूमे ग्रामीण, बोले - ये हमारे पुरखों की देन है, इसे बचाना है - अनिमा कच्छप मुखिया

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल फुदी पंचायत की मुखिया अनिमा कच्छप ने कहा कि "हमारा जो पारंपरिक जतरा का आयोजन होता है ये बहुत पहले से चला आ रहा है। हमारे जो पूर्वज थे वो साल भर खेती-बाड़ी करते हैं। ये समय कटनी का शुरुआत का होता है। गांव के लोग बहुत कड़ी मेहनत करते हैं, मेहनत करने के बाद उनको लगता है कि सभी लोग मिलकर एक साथ खुशी का उत्सव मनाएं, ताकि उनकी थकावट दूर हो और खुशी दुगनी हो जाए। इसी उपलक्ष्य में ये जतरा का आयोजन किया जाता है।"

उन्होंने कहा कि आज जो दशाई जतरा के अवसर पर राई में नाच गान का आयोजन किया गया है, ये भी हमारे पुरखों की देन है, हमारी पारंपरिक रीति-रिवाज है जिसे आगे बढ़ाते हुए आज के लोगों ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया है।

मोबाइल युग में भी जिंदा है असली संस्कृति

मुखिया अनिमा कच्छप ने कहा कि आज के समय में सब लोग मोबाइल से चिपके हुए रहते हैं, लेकिन इस जतरा में आए सभी लोग - बड़े-बुजुर्ग, युवा, बच्चे सभी मोबाइल से दूर हैं और खुद से गाना-बजाना कर रहे हैं।

"यहां कोई साउंड सिस्टम से गाना नहीं बज रहा है, लोग खुद से अपने स्वर में एक साथ मिलकर आदिवासी राग और गीत गा रहे हैं। ये हमारे लिए बहुत ही गर्व की बात है।" उन्होंने कहा कि जब दुनिया डिजिटल युग में बहुत आगे चली गई है, हर जगह सिस्टम से हर्षोल्लास मनाया जाता है, तब भी कहीं-कहीं हमारे गांव-पंचायत में आज भी लोग अपनी आदिवासी संस्कृति, अपने अलग-अलग राग और गीतों को खुद गाकर जिंदा रखे हुए हैं।

"राई में आयोजित पारंपरिक दशाई झण्डा जतरा" में  गांव के पहान, पड़हा राजा समेत बड़ी संख्या में विभिन्न गांव टोलों के ग्रामीण पारंपरिक वेश भूषा के साथ शामिल थे। गांव के अखड़ा में पूरे पारंपरिक वेशभूषा में लोग ढोल नगाड़ों के साथ नाचते-गाते नजर आए।

रिपोर्टर : शहीद अंसारी

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.