कारागार से गोकुल तक: भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य जन्म और बाल्य लीलाओं का अद्भुत वर्णन !
कुशीनगर : फाजिलनगर विकास खण्ड के ग्राम जौरा बाजार में आज श्रीमद भागवत कथा का चतुर्थ दिवस की कथा आचार्य सुबोध कान्त कपिल जी महाराज द्वारा संपादित किया जा रहा। आज कथा को श्रवण करने फाजिलनगर के पूर्व चेयरमैन की पत्नी सुनीता शाही व कानूनगो नन्दलाल पाठक का समान करते हुए आयोजक पारसनाथ सिंह जी द्वारा आभार व्यक्त किए। श्रीमद्भागवत कथा के चतुर्थ सोपान में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव और उनके प्रारंभिक बाल्यकालीन दिव्य लीलाओं का अत्यंत भावपूर्ण और अलौकिक वर्णन किया गया है। यह प्रसंग न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि भक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक भी है। श्रीकृष्ण का जन्म अत्याचारी राजा कंस के कारागार में हुआ। वे देवकी और वसुदेव की आठवीं संतान के रूप में प्रकट हुए। जन्म के समय संपूर्ण कारागार दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा। वातावरण में अद्भुत शांति और पवित्रता छा गई।
देवकी और वसुदेव ने भगवान के चतुर्भुज रूप का दर्शन किया, जिसमें वे शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए थे। भगवान ने उन्हें आश्वस्त करते हुए अपने मानव बाल रूप में आने का संकेत दिया।
योगमाया की अद्भुत शक्ति से कारागार के सभी द्वार स्वतः खुल गए और पहरेदार गहरी निद्रा में चले गए। वसुदेव जी के हाथों और पैरों की बेड़ियाँ स्वतः टूट गईं। यह दृश्य स्वयं में ईश्वरीय लीला का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
नवजात शिशु को टोकरी में रखकर वसुदेव जी मूसलाधार वर्षा के बीच मथुरा से गोकुल की ओर प्रस्थान करते हैं। मार्ग में उफनती हुई यमुना नदी भी भगवान के चरण स्पर्श हेतु झुक जाती है और सुरक्षित मार्ग प्रदान करती है।
गोकुल में उस समय नंद बाबा और यशोदा माता के घर एक कन्या का जन्म हुआ था। वसुदेव जी ने शिशु कृष्ण को वहाँ सुलाकर उस कन्या को साथ ले लिया। इस प्रकार भगवान का लालन-पालन गोकुल में हुआ, जहाँ उन्होंने अपनी मोहक बाल लीलाओं से समस्त ब्रजवासियों का हृदय जीत लिया।
श्रीमद्भागवत कथा का यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब ईश्वर स्वयं अवतरित होकर धर्म की स्थापना करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भक्ति, विश्वास और दिव्य प्रेम का प्रतीक है।
रिपोर्टर : सुरेन्द्र प्रसाद गोंड


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