निविदा पर सवाल: ₹4.20 करोड़ की 56 योजनाओं के टेंडर में गड़बड़ी की चर्चा, लाखों के नुकसान की आशंका

झुमरी तिलैया/कोडरमा : नगर परिषद क्षेत्र में करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं की निविदा प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में आ गई है। करीब ₹4.20 करोड़ की लागत वाली 56 विकास योजनाओं के टेंडर आवंटन को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चाओं का बाजार गर्म है। आरोप लगाए जा रहे हैं कि निविदा प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा को सीमित कर कुछ चुनिंदा संवेदकों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई, जिससे नगर परिषद को आर्थिक नुकसान होने की आशंका जताई जा रही है।

मिली जानकारी के अनुसार नगर परिषद द्वारा विभिन्न विकास कार्यों के लिए निविदा आमंत्रित की गई थी। इन योजनाओं में सड़क, नाली, सार्वजनिक सुविधाओं और अन्य विकास कार्य शामिल बताए जा रहे हैं। निविदा प्रक्रिया में भाग लेने के लिए बड़ी संख्या में संवेदकों ने डिमांड ड्राफ्ट (डीडी) जमा किए थे और प्रारंभिक चरण में प्रतिस्पर्धा भी दिखाई दी।

लेकिन जैसे-जैसे निविदा प्रक्रिया अंतिम चरण तक पहुंची, तस्वीर बदलती नजर आई। सूत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों के हवाले से यह बात सामने आ रही है कि जिन योजनाओं में कई संवेदकों ने रुचि दिखाई थी, उनमें अंतिम स्तर पर अधिकांश योजनाओं में केवल दो-दो संवेदकों द्वारा ही टेंडर दाखिल किया गया। इससे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।

करोड़ों के काम में ‘मैनेजमेंट’ की चर्चा

स्थानीय लोगों और संवेदकों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि टेंडर प्रक्रिया में कथित तौर पर ‘मैनेजमेंट’ किया गया। आरोप यह है कि कई योजनाओं में वास्तविक प्रतिस्पर्धा समाप्त कर दी गई, जिससे कार्य लगभग निर्धारित दरों पर ही आवंटित हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी टेंडर में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा नहीं होती, तो सरकारी संस्था को मिलने वाली संभावित बचत भी कम हो जाती है और इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है।

चर्चा यह भी है कि करोड़ों रुपये की इन योजनाओं में करीब 42 लाख रुपये तक की कथित बंदरबांट की आशंका जताई जा रही है। हालांकि इस संबंध में अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उठ रही चर्चाओं ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।

सबसे बड़ा सवाल—डीडी जमा करने वाले संवेदकों का क्या हुआ?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिन संवेदकों ने विधिवत डीडी जमा कर निविदा प्रक्रिया में भाग लेने की तैयारी की थी, वे अंतिम चरण में कहां गायब हो गए?
क्या उन्हें तकनीकी कारणों से बाहर किया गया या उन्होंने स्वयं निविदा नहीं डाली?
यदि बाहर किया गया, तो क्या उसके पीछे स्पष्ट और पारदर्शी कारण मौजूद हैं?

इन सवालों के जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं। कई संवेदकों के बीच भी इस बात को लेकर असंतोष बताया जा रहा है।

निविदा शुल्क से भी लाखों की अतिरिक्त आय की संभावना

जानकारी के मुताबिक निविदा प्रक्रिया में प्रत्येक योजना के लिए निर्धारित निविदा प्रपत्र शुल्क लिया गया था। यदि सभी इच्छुक संवेदकों को पूरी तरह प्रतिस्पर्धा का अवसर मिलता, तो नगर परिषद को निविदा शुल्क के माध्यम से भी अतिरिक्त राजस्व प्राप्त हो सकता था। अनुमान है कि इससे लाखों रुपये की अतिरिक्त आमदनी संभव थी।

प्रशासन का पक्ष

मामले को लेकर नगर परिषद प्रशासन ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी अंकित गुप्ता ने कहा कि पूरी निविदा प्रक्रिया नियमानुसार और पारदर्शी तरीके से संपन्न कराई गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक इस संबंध में किसी प्रकार की आधिकारिक शिकायत प्राप्त नहीं हुई है।

जांच की मांग तेज

इधर, स्थानीय लोगों और कुछ जनप्रतिनिधियों के बीच इस मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग उठने लगी है। लोगों का कहना है कि यदि निविदा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है, तो जांच से सच्चाई सामने आने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

अब देखना होगा कि करोड़ों रुपये की इन योजनाओं पर उठे सवालों के बीच प्रशासन आगे क्या कदम उठाता है और क्या इस मामले में किसी प्रकार की जांच या स्पष्टीकरण सामने आता है।

रिपोर्टर : श्रवण कुमार

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