कॉमेडियन कुणाल कामरा के साथ अब क्या करेगी सरकार ?

आजकल कॉमेडी के नाम पर कहीं अश्लीलता तो कहीं नफरत परोसी जा रही है .. स्टैंडअब कॉमेडी ने जहां लोगों को हंसाने का काम शुरू किया था ..वो अब किसी और काम के लिए जानी जा रही है . समय रैना वाला मसला अभी खत्म नहीं हुआ था कि अब महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे पर कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा की गई टिप्पणी ने सियासी बवंडर खड़ा कर दिया है... शिंदे गुट की शिवसेना ने जहां कामरा के खिलाफ मोर्चा खोला है, वहीं बीजेपी ने भी उन्हें " लपट" लगाने की अपील की है..दरअसल, कुणाल कामरा ने एक पैरोडी गीत के जरिए शिंदे पर हमला बोला, हालांकि सीधे नाम नहीं लिया, पर गद्दार शब्द का इस्तेमाल कर शिंदे के खिलाफ जहर उगला..इससे शिवसेना (शिंदे गुट) के कार्यकर्ता भड़क उठे और उस स्टूडियो को तोड़ डाला, जहां यह प्रोग्राम शूट हो रहा था...
इससे भी ज्यादा हैरानी की बात ये है कि कामरा ने ऐसा बोलने और बवाल होने के बाद मांफी मांगने की बजाए ... एक और नया पोस्ट कर डाला .. कामरा ने संविधान की तस्वीर पोस्ट कर ये दावा किया कि उनकी अभिव्यक्ति संविधान की धारा 19(1)(a) के तहत है, जो बोलने की स्वतंत्रता देती है....उनके हाथों में राहुल गांधी की तरह संविधान की कॉपी की नजर आई ... लेकिन कॉमेडियन कुणाल कामरा को शायद पता नहीं कि जिस संविधाव की कॉपी को वो अपने हाथ में लिए हैं , उसका एक पन्ना भी उनकी समझ से बाहर है .. क्योंकि ऐसा नहीं है कि संविधान हमें यह पूरी छूट देता है कि हम जो चाहें बोलें? बिल्कुल नहीं! भारतीय संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19 के तहत दिया है, लेकिन इस स्वतंत्रता पर कई सख्त रोक भी लगाई हैं...ऐसे मामले में संविधान क्या कहा है ऐसे समझिए -
अगर किसी बयान से देश की संप्रभुता या अखंडता को खतरा हो, तो उस पर रोक लग सकती है
अगर किसी बयान से राज्य की सुरक्षा खतरे में पड़ती हो, तो उस पर रोक लग सकती है
अगर बयान से किसी विदेशी राज्य के साथ रिश्ते खराब हो सकते हों, तो भी रोक लग सकती है
अगर बयान से सार्वजनिक व्यवस्था खतरे में पड़ती हो , तो भी रोक लग सकती है
अगर बयान से अदालत की अवमानना हो, तो भी रोक लग सकती है
अगर बयान से किसी की मानहानि हो, तब भी रोक लगाई जा सकती है
अगर बयान से किसी अपराध को बढ़ावा मिलता हो , तब भी रोक लग सकती है
यानी की कॉमेडियन कुणाल कामरा को शायद ये नियम नहीं पता .. इसीलिए सरकार के खिलाफ जाकर इतना बड़ा कदम उठाया है ...किसी प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान उपमुख्यमंत्री को गद्दार कहने का परिणाम क्या हो सकता है ये कुणाल कामरा समझ नहीं पा रहे हैं .. अब शायद समय आ गया है कि कुणाल कामरा को संविधान की किताब हाथ में लेकर यह याद दिलाना चाहिए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ अपनी बात रखने का अधिकार नहीं है, बल्कि यह समझने का भी अधिकार है कि कहने की सीमा कहां तक है। अगर मजाक और तंज की आड़ में संविधान की इज्जत उछालने की कोशिश करेंगे, तो कहीं न कहीं ये स्वतंत्रता की सही समझ से दूर हो जाएगा। अब सरकार कुणाल कामरा के साथ क्या करती है ये जरूर देखने वाली बात होगी ..फिलहाल इसी के साथ रूख करेंगे हमारी अगली रिपोर्ट की ओर
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