कुसुम की खेती से किसानों को फायदा, MSP में 675 रुपये की बढ़ोतरी

रबी सीजन में किसान ऐसी फसलों का चुनाव करते हैं, जिनमें कम पानी में भी अच्छी पैदावार मिल सके। कुसुम ऐसी ही प्रमुख तिलहन फसलों में शामिल है, जिसकी खेती कम पानी और वर्षा आधारित क्षेत्रों में की जाती है। कुसुम के बीजों में करीब 24 से 36 फीसदी तक तेल पाया जाता है, जिसका इस्तेमाल खाद्य तेल के अलावा साबुन, पेंट और वार्निश बनाने में भी होता है। इस बार सरकार ने छह रबी फसलों में कुसुम की MSP में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी की है।

कुसुम की MSP में 675 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी

केंद्र सरकार ने कुसुम की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को 6,540 रुपये से बढ़ाकर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है। यानी किसानों को पिछले भाव की तुलना में 675 रुपये प्रति क्विंटल अधिक MSP मिलेगी। सरकार का जोर कम पानी वाले क्षेत्रों में तिलहन फसलों का उत्पादन बढ़ाने पर भी है। महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात में कुसुम की खेती प्रमुख रूप से की जाती है।

सितंबर के आखिर से अक्टूबर तक करें बुवाई

कुसुम की बुवाई के लिए सितंबर के अंतिम दिनों से अक्टूबर के पहले सप्ताह तक का समय उपयुक्त माना जाता है। किसान इसकी बुवाई कतारों में करें तो फसल की देखभाल आसान रहती है। कतार से कतार की दूरी करीब 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 25 सेंटीमीटर रखी जा सकती है। बीज को 3 से 4 सेंटीमीटर की गहराई में बोना उचित रहता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए करीब 15 से 20 किलो बीज पर्याप्त माना जाता है।

बुवाई से पहले बीज उपचार जरूरी

कुसुम की अच्छी फसल के लिए बुवाई से पहले बीज उपचार करना फायदेमंद रहता है। इसके लिए प्रति किलो बीज में कैप्टान, थीरम या मैंकोजेब की 3 ग्राम मात्रा से उपचार किया जा सकता है। खेत की तैयारी के दौरान प्रति हेक्टेयर करीब 15 टन सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में अच्छी तरह मिला सकते हैं। इसके अलावा रासायनिक खाद के रूप में 60 किलो नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 20 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर का इस्तेमाल किया जा सकता है।

कम पानी में भी अच्छी होती है कुसुम की खेती

कुसुम को कम पानी और वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। यदि खेत में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है तो बुवाई के करीब 30 दिन बाद एक सिंचाई की जा सकती है। फसल में खरपतवार अधिक होने पर समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना जरूरी है, ताकि पौधों को पर्याप्त पोषक तत्व और नमी मिल सके।

130 से 140 दिन में तैयार हो जाती है फसल

कुसुम की फसल आमतौर पर बुवाई के करीब 130 से 140 दिन बाद पककर तैयार हो जाती है। असिंचित खेतों में करीब 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन मिल सकता है, जबकि सिंचाई की सुविधा वाले खेतों में उपज 14 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। ऐसे में कम पानी वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए बढ़ी हुई MSP के बीच रबी सीजन में कुसुम एक उपयोगी तिलहन फसल का विकल्प हो सकती है।

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