हिसाब
लघु कथा :
कई दिनों बाद पिता और बेटा आमने-सामने बैठे थे। पिता के हाथ में पुरानी डायरी थी और बेटे की निगाहें बार-बार दरवाजे की ओर जा रही थीं।
‘कितना कमाते हो अब?’ पिता ने पूछा।
‘बस... गुजारा हो जाता है।’
‘गुजारा?’ पिता हल्का-सा हँसे, ‘हमने तुम्हें पढ़ाया किसलिए था? ताकि तुम गुजारा करो?’
बेटा चुप रहा।
‘शर्मा जी का बेटा देखो। सरकारी नौकरी में लग गया। मकान बनवा लिया। गाड़ी ले ली।’
‘मैं भी कोशिश कर रहा हूँ।’
‘कोशिश!’ पिता ने डायरी बंद कर दी, ‘तुम्हारी यही कोशिश पिछले पाँच साल से चल रही है।’
कुछ देर कमरे में खामोशी रही।
माँ रसोई से चाय रख गई।
पिता ने एक कप उठाया और बोले, ‘तुम्हें पता है, तुम्हारी पढ़ाई पर कितना खर्च किया था?’
बेटे ने सिर उठाया।
‘नहीं।’
‘मुझे पता है।’ पिता ने डायरी फिर खोली, ‘एक-एक पैसे का हिसाब रखा है।’
बेटा डायरी को देखता रहा।
‘लेकिन पिताजी,’ उसने धीरे से कहा, ‘आपने कभी यह हिसाब रखा कि माँ की दवाइयाँ किसने खरीदीं?’
पिता का हाथ रुक गया।
‘जब आप बीमार पड़े थे, अस्पताल कौन ले गया था?’
पिता ने कोई उत्तर नहीं दिया।
‘और पिछले दो साल से घर का किराया कौन दे रहा है?’
कमरे में अचानक जैसे हवा थम गई।
बेटे ने जेब से कुछ कागज निकाले और मेज पर रख दिए।
‘यह माँ की दवाइयों के बिल हैं... यह अस्पताल का खर्च... और यह घर का किराया।’
पिता कागजों को देखते रहे।
बेटा उठ खड़ा हुआ।
‘आपने मेरी पढ़ाई का हिसाब रखा, पिताजी... मैंने आपका बुढ़ापा संभालने का।’
वह दरवाजे तक पहुँचा।
पीछे से पिता की धीमी आवाज आई—
‘बेटा... इनका हिसाब किस डायरी में लिखूँ?’
बेटा पलटा।
‘कहीं मत लिखिए... बस याद रखिए।’
और वह चला गया।
No Previous Comments found.