लाला लाजपत राय: लाठी की चोट से हिली ब्रिटिश हुकूमत...
By-Ujjwal Singh
"मैं रहूँ या न रहूँ, पर ये वादा है मेरा तुम से, मेरे मरने के बाद वतन पे मरने वालों का सैलाब आएगा"
आज़ादी की कहानी का अमर अध्याय... भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास बलिदान, साहस और संघर्ष से भरा हुआ है. इसी इतिहास में लाला लाजपत राय का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है. वे उन नेताओं में से थे जिनकी आवाज़, विचार और साहस से अंग्रेजी हुकूमत कांप उठी थी. “पंजाब केसरी” कहलाने वाले लाला लाजपत राय ने न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्वतंत्रता की अलख जगाई। उनकी शहादत ने आज़ादी की लड़ाई को नई दिशा दी.
बचपन से क्रांति की ओर
लाला लाजपत राय को बचपन से ही लेखन और भाषण देने का विशेष शौक था। विद्यार्थी जीवन में ही उनका संपर्क आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती से हुआ, जिसने उनके विचारों को राष्ट्रभक्ति से जोड़ दिया. ब्रिटिश शासन के अत्याचारों को देखकर उन्होंने यह निश्चय कर लिया कि वे अपना पूरा जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित करेंगे. उनका मानना था कि जब तक भारत का हर युवा जागरूक नहीं होगा, तब तक गुलामी समाप्त नहीं होगी.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आज़ादी की आवाज़
लाला लाजपत राय यह समझ चुके थे कि अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए संघर्ष को वैश्विक मंच तक ले जाना आवश्यक है। उन्होंने विदेशों में जाकर भारत की दयनीय स्थिति और अंग्रेजों के अत्याचारों को दुनिया के सामने रखा. भारत लौटने के बाद वे असहयोग आंदोलन से जुड़े और पंजाब में इसकी कमान संभाली.
लाठीचार्ज और अमर शहादत
1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नेतृत्व करते हुए उन पर निर्मम लाठीचार्ज किया गया. गंभीर चोटों के बावजूद उन्होंने कहा “मेरे शरीर पर पड़ी हर लाठी अंग्रेजी हुकूमत के कफन की कील होगी" .
17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी शहादत ने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को जन्म दिया और अंततः अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया.


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