बसिया पंचायत के ग्रामीणों ने लगाई उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक से गुहार, कहा हमें मिल रही धमकियाँ बंद नहीं हुई तो राजभवन के समक्ष कर लेंगे सामूहिक आत्मदाह!

लातेहार :  झारखंड राज्य में लागू पेसा नियमावली के बाद एक कहावत बहुप्रचलित है "ना राज्यसभा न लोकसभा सबसे बड़ी ग्राम सभा"  लेकिन बावजूद इसके आज लातेहार जिला मुख्यालय में लातेहार जिले के बालूमाथ प्रखंड के बसिया पंचायत के ग्राम प्रधान के नेतृत्व में सड़कों पर भटकते कुछ ग्रामीणों ने सहसा मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। 

उनसे बात करने पर पता चला कि ये लोग बसिया पंचायत से ग्राम सभा के प्रतिनिधि के तौर पर जिला मुख्यालय पहुंचे हैं और ग्राम सभा के अधिकारों और अपनी सुरक्षा के लिए उपयुक्त लातेहार, पुलिस अधीक्षक लातेहार तथा जिला खनन पदाधिकारी लातेहार के समक्ष गुहार लगाने आए हैं।

इस बाबत बताते हुए बसिया ग्राम के ग्राम प्रधान बाबूलाल गंझू ने कहा कि उनके पंचायत में जंगलों-पहाड़ों के बीच रहने वाले आदिवासी परिवार मुख्य रूप से खेती-बाड़ी पर निर्भर थे और उनका जीवन सामान्य तरीके से चल रहा था तभी अनायास उनके पंचायत में कोयले की साइडिंग बनाने का प्रस्ताव सरकार ने पारित किया और उसके बाद साइडिंग बनकर तैयार भी हो गया लेकिन तब से उनके जीवन में जो अमूल-चूल परिवर्तन आया उसने उनकी और उनके गांव की जिंदगी तहस-नहस करके रख दी!

अपनी समस्याओं के बारे में बताते हुए ग्राम प्रधान ने कहा कि साइडिंग से उड़ने वाले कोल्ड डस्ट और तेज रफ्तार से चलने वाले हाईवा और अन्य वाहनों के कारण ग्रामीणों का जीना दुभर हो गया है। कोल डस्ट  से परेशान होकर जब बसिया की ग्राम सभा ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि राज्य में लागू पेसा नियमावली के कारण बिना ग्राम सभा को विश्वास में लिए कोई भी पक्ष यहां कोयले की डंपिंग और लोडिंग नहीं करेगा तो फिर इस घटना में एक नया मोड़ आया। लगातार ग्राम सभा के प्रतिनिधियों, ग्राम प्रधान और अन्य लोगों को कोयला माफियाओं, पूंजीपतियों, विचौलियां के माध्यम से धमकियां मिलने लगी। उन्हें डराया धमकाया जाने लगा और जबरन कोयले की लोडिंग के लिए दबाव भी बनाए जाने लगा।

थक-हार कर उन्होंने इसकी गुहार स्थानीय प्रशासन से लगाई लेकिन नतीजा सिफर रहा। धमकियों के मिलने से ग्राम प्रधान वहां के पहड़ा राजा प्रभु दयाल उरांव और स्थानीय ग्रामीण काफी परेशान हैं और थक-हार कर उन्होंने जिले के वरिष्ठ पदाधिकारी के समक्ष गुहार लगाने की सोची।

एक आवेदन के माध्यम से उन्होंने वरिष्ठ पदाधिकारीयों से गुहार लगाया है कि उनको मिल रही धमकियों को रोकने की दिशा में ठोस और सार्थक पहल किए जाएं, अगर ऐसा नहीं होता है तो गरीब आदिवासी होने के नाते उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है और वह अपने सैकड़ो परिवारों के साथ राज्य की राजधानी रांची स्थित राजभवन जो अब लोक भवन के नाम से जाना जाने लगा है वहां अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जाएंगे और अगर फिर भी उनकी बात नहीं सुनी गई तो सामूहिक आत्मदाह कर लेंगे क्योंकि उनके पास अब कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। ग्राम पंचायत के सदस्यों के इस ज्ञापन के बाद लातेहार में अचानक से सरगर्मी तेज हो गई। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया के लोगों ने जब इस बाबत जाना तो उन्होंने ग्राम पंचायत के लोगों को आश्वासन दिया कि हर संभव उनकी मदद करेंगे। यहां यह बताना महत्वपूर्ण है कि राज्य भर में कोयले का खनन चरम पर है और इससे प्रभावित और विस्थापित होने वाले ग्रामीणों की स्थिति भी बद्तर होती जा रही है। अगर बसिया ग्राम के लोगों की बात सही है तो यह नई बहस छिड़ जाती है कि पेसा कानून का कितने प्रभावित तरीके से पालन किया जा रहा है। यहां यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अगर पेसा कानून लागू होने के बावजूद भोले-भाले मासूम ग्रामीणों को माफियाओं और पूंजीपतियों के द्वारा धमकियां मिल सकती है तो फिर इस कानून का औचित्य ही क्या रहा। बरहाल बसिया पंचायत के लोगों के इस आवेदन के बाद से एक ओर जहां कोयला माफियाओं के नापाक मंसूबे पर विराम लगने की संभावना है वहीं दूसरी ओर राज्य में लागू पेसा कानून के ऊपर भी एक सकारात्मक बहस प्रारंभ होगी ऐसा माना जा रहा है।

रिपोर्टर : बब्लू खान 

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