किराए की कोख देने वाली माताओं का दर्द: सिंधु मिश्रा
लातेहार : मां बनना केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक स्त्री के जीवन का सबसे गहरा और पवित्र अनुभव माना जाता है। नौ महीने तक अपने गर्भ में एक शिशु को पालना, उसकी हर हलचल को महसूस करना, उसके साथ भावनात्मक रिश्ता बनाना—यह अनुभव शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। लेकिन समाज में कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जो अपनी आर्थिक मजबूरियों, पारिवारिक परिस्थितियों या किसी और कारण से अपनी कोख किसी दूसरे दंपति के लिए किराए पर देती हैं। इन्हें हम सरोगेट मदर या "किराए की कोख देने वाली मां" कहते हैं।
अक्सर लोग इस व्यवस्था को केवल एक समझौता या आर्थिक लेन-देन मान लेते हैं, लेकिन इसके पीछे छिपी उस मां की पीड़ा, संघर्ष और भावनाओं को बहुत कम लोग समझ पाते हैं।
कल्पना कीजिए उस महिला की, जो नौ महीने तक अपने गर्भ में पल रहे बच्चे की हर धड़कन महसूस करती है। वह उसके लिए खान-पान का ध्यान रखती है, हर सावधानी बरतती है, उसके स्वस्थ जन्म के लिए भगवान से प्रार्थना करती है। लेकिन जैसे ही बच्चा जन्म लेता है, उसे अपनी गोद में रखने का अधिकार भी उससे छिन जाता है। वह जानती है कि यह बच्चा उसका नहीं है, फिर भी मां का हृदय इस सच को इतनी आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता।
कई बार ऐसी महिलाएं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आती हैं। अपने बच्चों की पढ़ाई, घर की जरूरतें, माता-पिता के इलाज या कर्ज़ चुकाने के लिए वे यह कठिन निर्णय लेती हैं। बाहर से देखने वाले लोग सोचते हैं कि उन्हें इसके बदले धन मिल जाता है, लेकिन क्या कोई धन उस भावनात्मक खालीपन की भरपाई कर सकता है, जो एक मां अपने गर्भ में पल रहे बच्चे से बिछड़ने के बाद महसूस करती है?
समाज भी उनके साथ हमेशा न्यायपूर्ण व्यवहार नहीं करता। कई बार उन्हें तानों का सामना करना पड़ता है, उनके चरित्र पर सवाल उठाए जाते हैं और उनकी मजबूरी को समझने के बजाय उनका मजाक बनाया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि वे किसी निःसंतान दंपति के जीवन में खुशियां लाने का माध्यम बनती हैं। उनके त्याग के कारण किसी सूने आंगन में किलकारियां गूंजती हैं।
यह भी सच है कि हर सरोगेसी शोषण नहीं होती। कई मामलों में यह पूरी कानूनी प्रक्रिया, चिकित्सा देखरेख और आपसी सहमति के साथ होती है। लेकिन फिर भी उस महिला की भावनाएं वास्तविक होती हैं। गर्भ में पलने वाला शिशु उसके शरीर का हिस्सा बन जाता है और उससे अलग होना किसी भी मां के लिए आसान नहीं होता।
आज भारत में सरोगेसी को लेकर कानून बनाए गए हैं ताकि महिलाओं का शोषण न हो और इस प्रक्रिया में उनकी गरिमा और अधिकार सुरक्षित रहें। यह आवश्यक भी है, क्योंकि किसी महिला की कोख केवल कमाई का साधन नहीं बननी चाहिए। उसके स्वास्थ्य, सम्मान, मानसिक स्थिति और भविष्य की सुरक्षा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
समाज को भी अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है। हमें ऐसी महिलाओं को दया या तिरस्कार की दृष्टि से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सम्मान के साथ देखना चाहिए। उनके निर्णय के पीछे छिपी परिस्थितियों को समझना चाहिए। हर महिला जो अपनी कोख किराए पर देती है, वह केवल पैसे के लिए ऐसा नहीं करती; कई बार वह किसी निःसंतान दंपति के जीवन में आशा की किरण भी बनना चाहती है।
अंततः, मां का हृदय हर परिस्थिति में मां ही रहता है। चाहे बच्चा उसके पास रहे या किसी और की गोद में चला जाए, नौ महीने का वह रिश्ता उसकी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहता है। इसलिए किराए की कोख देने वाली माताओं के दर्द को केवल एक अनुबंध या आर्थिक लेन-देन के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और त्याग की दृष्टि से समझने की आवश्यकता है।
जब भी हम सरोगेसी की बात करें, तो केवल उस दंपति की खुशी ही नहीं, बल्कि उस महिला की भावनाओं, सम्मान और संघर्ष को भी याद रखें, जिसने अपने जीवन के सबसे अनमोल नौ महीने किसी और की मुस्कान के नाम कर दिए।
रिपोर्टर : बब्लू खान
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