आइये इस होली को एक कवि की नजर से देखते हैं

होली एक ऐसा पर्व है जो हर किसी को रंग खेलने पर विवश कर देता है . इस दिन कोई भी रंग से अछूता नहीं रह सकता . होली के महीने के आगमन से ही होली के आने की खुशबू हंवों संग बहने लगती है .और घर घर जाकर दरवाजे पर होली के आगमन की दस्तक देती है .पलाश के पत्ते भी होली का संदेश देने में पीछे नहीं रहते .अपने सुर्ख लाल रंग से हर किसी को होली के आगमन का सन्देश देते हुए नजर आते हैं . होली को और भी खूबसूरत और रंगीन बनाने में लेखक और कवि भी पीछे नहीं है .अपनी रचनाओं के माध्यम से कवियों ने होली को एक अद्भुत रूप में पेश किया है .ऐसी ही कवि नीरज गोस्वामी ने होली के आगमन पर बहुत ही खूबसूरत रचना लिखी है .आइये इस होली को कवि नीरज गोस्वमी के नजर से देखते हैं ....
करें जब पाँव खुद नर्तन, समझ लेना कि होली है
हिलोरें ले रहा हो मन, समझ लेना कि होली है
इमारत इक पुरानी सी, रुके बरसों से पानी सी
लगे बीवी वही नूतन, समझ लेना कि होली है
कभी खोलो हुलस कर, आप अपने घर का दरवाजा
खड़े देहरी पे हों साजन, समझ लेना कि होली है
तरसती जिसके हों दीदार तक को आपकी आंखें
उसे छूने का आये क्षण, समझ लेना कि होली है
हमारी ज़िन्दगी यूँ तो है इक काँटों भरा जंगल
अगर लगने लगे मधुबन, समझ लेना कि होली है
बुलाये जब तुझे वो गीत गा कर ताल पर ढफ की
जिसे माना किये दुश्मन, समझ लेना कि होली है
अगर महसूस हो तुमको, कभी जब सांस लो 'नीरज'
हवाओं में घुला चन्दन, समझ लेना कि होली है
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