“मौत के बाद भी पितृत्व? जानिए स्पर्म कितनी देर तक रहता है जिंदा और क्या बन सकती है मां”
BY UJJWAL SINGH
मेडिकल साइंस की तरक्की ने कई ऐसे सवालों को जन्म दिया है, जो पहले केवल कल्पना तक सीमित थे. उन्हीं में से एक है ,क्या किसी पुरुष की मृत्यु के बाद भी उसका स्पर्म जीवित रह सकता है और क्या उससे महिला मां बन सकती है? यह विषय जितना दिलचस्प है, उतना ही संवेदनशील भी, क्योंकि इसमें विज्ञान के साथ-साथ कानूनी और नैतिक पहलू भी जुड़े हुए हैं.
पोस्टह्यूमस स्पर्म रिट्रीवल क्या है?
मौत के बाद शरीर से स्पर्म निकालने की प्रक्रिया को “पोस्टह्यूमस स्पर्म रिट्रीवल” कहा जाता है. इस तकनीक के माध्यम से मृत पुरुष के स्पर्म को सुरक्षित निकालकर भविष्य में उसकी पार्टनर के लिए प्रेग्नेंसी हेतु उपयोग किया जा सकता है. आधुनिक प्रजनन तकनीकों, जैसे IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन), ने इसे संभव बनाया है. हालांकि, यह प्रक्रिया हर केस में आसान नहीं होती और इसके लिए विशेषज्ञों की निगरानी जरूरी होती है.
कितने समय तक जीवित रहता है स्पर्म?
विशेषज्ञों के अनुसार, मृत्यु के बाद स्पर्म सीमित समय तक ही जीवित रहता है. आमतौर पर 24 घंटे के भीतर स्पर्म को निकालना सबसे सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि इस समय तक उसकी गुणवत्ता और जीवित रहने की संभावना अधिक होती है। कुछ मामलों में 36 घंटे तक भी स्पर्म प्राप्त किया जा सकता है, लेकिन समय बढ़ने के साथ इसकी गुणवत्ता तेजी से गिरती जाती है. इसलिए इस प्रक्रिया में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है.
कानूनी और नैतिक चुनौतियां
हालांकि मेडिकल तौर पर यह संभव है, लेकिन कानूनी और नैतिक चुनौतियां इस प्रक्रिया को जटिल बना देती हैं. कई देशों में इस विषय पर स्पष्ट कानून नहीं हैं. यदि मृत व्यक्ति ने पहले से अपनी सहमति नहीं दी हो, तो उसके स्पर्म के उपयोग को लेकर विवाद हो सकता है. कई बार परिवार को कोर्ट की अनुमति भी लेनी पड़ती है, जिससे समय की देरी हो जाती है और सफलता की संभावना कम हो जाती है.
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञ मानते हैं कि जैसे लोग अंगदान के बारे में पहले से निर्णय लेते हैं, वैसे ही इस विषय पर भी कपल्स को खुलकर चर्चा करनी चाहिए. पुरुषों को यह तय करना चाहिए कि क्या वे अपनी मृत्यु के बाद पिता बनना चाहते हैं. यह केवल वैज्ञानिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक निर्णय भी है.
मौत के बाद स्पर्म से पिता बनने की संभावना विज्ञान ने संभव तो कर दी है, लेकिन यह कई जटिलताओं से जुड़ा हुआ विषय है. सही समय, कानूनी अनुमति और नैतिक सहमति इन तीनों का संतुलन ही इस प्रक्रिया की सफलता तय करता है.

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