Cancer Survivors: कैंसर से बचना ही नहीं, बेहतर जिंदगी जीना भी है सबसे बड़ी चुनौती
अब तक कैंसर के इलाज का सबसे बड़ा उद्देश्य मरीज की जान बचाना माना जाता था, लेकिन चिकित्सा जगत की सोच अब बदल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर से बच जाने के बाद भी मरीजों की चुनौतियां खत्म नहीं होतीं। बेहतर इलाज, आधुनिक सर्जरी और समय पर बीमारी की पहचान के कारण अब पहले से अधिक लोग कैंसर को मात देकर लंबा जीवन जी रहे हैं। ऐसे में उनकी शारीरिक और मानसिक देखभाल स्वास्थ्य व्यवस्था की नई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बन गई है।
कैंसर सर्वाइवर्स की बढ़ती संख्या बनी नई स्वास्थ्य चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में दुनिया भर में कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी होने की आशंका है। इसके साथ ही कैंसर से ठीक हो चुके मरीजों यानी कैंसर सर्वाइवर्स की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। हालांकि, इन मरीजों को लंबे समय तक मेडिकल और मानसिक सहयोग की जरूरत होती है, लेकिन इस पहलू पर अक्सर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
डॉक्टरों का कहना है कि समय पर बीमारी का पता लगने, बेहतर उपचार तकनीकों और सर्जरी में हुए सुधार के कारण मरीज पहले की तुलना में अधिक समय तक जीवित रह रहे हैं। इससे स्वास्थ्य सेवाओं के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं।
सिर्फ इलाज नहीं, नियमित देखभाल भी है जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर सर्वाइवर्स के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच, फिजियोथेरेपी, संतुलित खानपान, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सहायता, दर्द से राहत और सही जानकारी बेहद जरूरी है। इससे मरीजों का आत्मविश्वास बढ़ता है और वे सामान्य जीवन की ओर बेहतर तरीके से लौट पाते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट भी इस बात पर जोर देती है कि कैंसर केवल शरीर को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि व्यक्ति के जीवन के कई अन्य पहलुओं पर भी गहरा असर डालता है। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था को इलाज के साथ-साथ मरीजों की दीर्घकालिक देखभाल पर भी समान रूप से ध्यान देना चाहिए।
इलाज खत्म होने के बाद भी बनी रहती हैं कई परेशानियां
डॉक्टरों के मुताबिक, कई मरीज यह मान लेते हैं कि इलाज पूरा होने के साथ ही उनकी बीमारी से जुड़ी सभी समस्याएं खत्म हो जाती हैं, जबकि वास्तव में यहीं से एक नई यात्रा शुरू होती है। कैंसर और उसके इलाज के दुष्प्रभाव कई वर्षों तक बने रह सकते हैं।
इनमें लगातार थकान, नसों से जुड़ी समस्याएं, हृदय रोग, हार्मोनल बदलाव, प्रजनन संबंधी कठिनाइयां और कैंसर के दोबारा होने का खतरा शामिल है। इसके अलावा कई मरीज बीमारी के लौट आने के डर, डिप्रेशन और एकाग्रता की कमी जैसी मानसिक समस्याओं से भी जूझते हैं। इसलिए डॉक्टर समय-समय पर नियमित जांच कराने और मानसिक स्वास्थ्य का भी विशेष ध्यान रखने की सलाह देते हैं।
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