Japanese Encephalitis: डेंगू-मलेरिया से भी खतरनाक हो सकती है यह बीमारी, मच्छर के काटने से दिमाग तक पहुंच जाता है वायरस

मानसून का मौसम जहां राहत लेकर आता है, वहीं मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा भी बढ़ा देता है। अधिकांश लोग डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों से परिचित हैं, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि कुछ मच्छर ऐसे वायरस भी फैलाते हैं, जो सीधे दिमाग को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसी ही एक गंभीर बीमारी है जापानी इंसेफेलाइटिस (Japanese Encephalitis)। यह बीमारी भले ही डेंगू जितनी आम न हो, लेकिन गंभीर मामलों में जानलेवा साबित हो सकती है और मरीज को जीवनभर के लिए न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

कैसे फैलता है जापानी इंसेफेलाइटिस?

जापानी इंसेफेलाइटिस, जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस (JEV) के कारण होता है, जो फ्लैविवायरस परिवार का सदस्य है। इसी परिवार में डेंगू और वेस्ट नाइल वायरस भी शामिल हैं। यह वायरस संक्रमित क्यूलेक्स (Culex) मच्छरों के काटने से फैलता है। ये मच्छर धान के खेतों, तालाबों, दलदली क्षेत्रों और बारिश के बाद जमा पानी में पनपते हैं। डेंगू फैलाने वाले मच्छरों के विपरीत, क्यूलेक्स मच्छर शाम से लेकर सुबह तक अधिक सक्रिय रहते हैं।

दिमाग तक कैसे पहुंचता है वायरस?

फोर्टिस अस्पताल, मोहाली के न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. ईशांक गोयल के अनुसार, यह वायरस सबसे पहले खून में प्रवेश करता है और फिर ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार कर दिमाग तक पहुंच जाता है। इसके बाद दिमाग में सूजन आ जाती है, जिसे मेडिकल भाषा में इंसेफेलाइटिस कहा जाता है।

हर साल सामने आते हैं हजारों मामले

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, हर साल दुनिया भर में जापानी इंसेफेलाइटिस के करीब 68 हजार मामले दर्ज किए जाते हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र इससे सबसे अधिक प्रभावित हैं। भारत में भी हर वर्ष इसके मामले सामने आते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग, धान के खेतों में काम करने वाले किसान और बिना टीकाकरण वाले यात्री संक्रमण के अधिक जोखिम में रहते हैं।

क्या हैं इसके लक्षण और इलाज?

शुरुआत में मरीज को बुखार, सिरदर्द, उल्टी, थकान और कमजोरी जैसे सामान्य वायरल संक्रमण के लक्षण दिखाई दे सकते हैं। लेकिन यदि वायरस दिमाग तक पहुंच जाए तो तेज बुखार, भ्रम की स्थिति, बेहोशी, दौरे पड़ना, गर्दन में अकड़न, चलने में परेशानी और होश खोने जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। डॉक्टरों के अनुसार, केवल सीटी स्कैन से हमेशा इसकी पहचान नहीं हो पाती। जरूरत पड़ने पर एमआरआई और खून या सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) की जांच के जरिए बीमारी की पुष्टि की जाती है।

फिलहाल जापानी इंसेफेलाइटिस का कोई विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। उपचार के दौरान मरीज की स्थिति को स्थिर रखने और जटिलताओं को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। इसलिए विशेषज्ञ इस बीमारी से बचाव, मच्छरों से सुरक्षा और समय पर टीकाकरण को सबसे प्रभावी उपाय मानते हैं।

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.