मैथिलीशरण गुप्त की कविता:'नारी '

मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964) हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे, जिन्हें "राष्ट्रकवि" की उपाधि दी गई थी। वे खड़ी बोली हिंदी के पहले महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं और उनकी रचनाएँ राष्ट्रीयता, सामाजिक सुधार और सांस्कृतिक चेतना से ओत-प्रोत हैं। आईये पढ़ते हैं उनके द्वारा लिखी हुई कविता 'नारी'- 

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

तू त्यागमयी, तू प्रेममयी,
संस्कारों की धारिणी।
फिर भी जग तुझे अबला कहे,
क्यों सहती यह मारिणी?

शोषण सहकर भी क्यों चुप है?
कब तक यूँ घुट-घुट मरती?
क्या तेरी किस्मत में केवल,
दुख की कड़ियाँ ही भरती?

क्या भूल गई अपनी शक्ति?
क्यों बंधनों में रहती?
जिसकी ममता से जग पलता,
क्यों इतनी असहाय रहती?

तेरे ही आँचल की छाया में,
हर जन जीवन पाता।
तेरी ममता की गंगा से,
सारा संसार नहाता।

फिर क्यों तू असहाय बनी,
क्यों सब कुछ सह जाती?
कभी शक्ति बन दुर्गा बन,
कभी काली बन जाती।

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।

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