कबीर के पद: बालपने की मैली अँगिया विषय-दाग़ परिजाई।

माया महा ठगनी हम जानी....

माया महा ठगनी हम जानी।

तिरगुन फाँसि लिये कर डोलै, बोलै मधुरी बानी।
केसव के कमला होइ बैठी, सिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत होइ बैठी तीरथहू में पानी।
जोगी के जोगिन होइ बैठी, काहू के कौड़ी कानी।
भक्तन के भक्तिन होइ बैठी, ब्रह्मा के ब्रह्मानी।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, यह सब अकथ कहानी॥

भावार्थ:- हम माया को बहुत बड़ी ठगनी समझते हैं, उसके हाथ में त्रिगुण की फाँसी का फंदा है और होंठों पर मीठे बोल। केशव (विष्णु) के यहाँ कमला (लक्ष्मी) बन बैठी और शिव के यहाँ भवानी। पांडे घर मूर्ति बनी बैठी है और तीर्थ में पानी। जोगी के घर में जोगन हो गई और राजा के घर रानी। किसी के यहाँ हीरा बनकर आई और किसी के यहाँ कानी कौड़ी। भक्तों के यहाँ भक्तिन हो गई और ब्रह्मा के घर ब्रह्मानी। सुनो भाई साधु, कबीर कहते हैं कि यह अकथनीय कथा है।
दुलहिन अँगिया काहे न धोवाई।

बालपने की मैली अँगिया विषय-दाग़ परिजाई।
बिन धोये पिय रीझत ना हीं, सेज सें देत गिराई।
सुमिरन ध्यान कै साबुन करि ले सत्तनाम दरियाई।
दुबिधा के भेद खोल बहुरिया मन कै मैल धोवाई।
चेत करो तीनों पन बीते, अब तो गवन नगिचाई।
पालनहार द्वार हैं ठाढ़ै अब काहे पछिताई।
कहत कबीर सुनो री बहुरिया चित अंजन दे आई॥

भावार्थ:-  हे दुल्हिन, तूने अपनी अँगिया क्यों नहीं धुलवाई। यह बचपन की मैली अँगिया है जिस पर विषय-वासना के धब्बे पड़े हुए हैं। इसे बिना धोए प्रियतम रीझते नहीं हैं और सेज से नीचे गिरा देते हैं। भगवान की याद को अपना साबुन बना ले और सत्त नाम को दरिया। ए दुल्हिन, दुविधा की गाँठें खोल दे और मन का मैल धो डाल। ज़रा विचार तो कर, आयु के तीन भाग बीत चुके हैं और गौने का समय निकट आ गया है। तेरा पाने वाला दरवाज़े पर खड़ा है। अब क्यों उदास है। कबीर कहते हैं कि ए दुल्हिन, अपने मन की आँख में ज्ञान का काजल लगाकर आ जा।

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