बचपन के किस्से- "कागज़ की कश्ती और सपनों का जहान"
कागज़ की कश्ती, बारिश का पानी,
छोटी-सी दुनिया, सपनों की रानी।
गली में गूँजती हँसी की धुन,
खेल-खिलौनों से सजता था गगन।
मिट्टी में ढूँढते छोटे-छोटे रत्न,
पलकों पर सजे अनगिनत सपन।
आम के पेड़ पे चढ़ना चोरी-चोरी,
फिर डाँट से बचना, हँसी में पूरी।
कंचों की खनक, लट्टू का घूमना,
छुपन-छुपाई में सबका झूमना।
न किताबों का बोझ, न चिंता का भार,
हर दिन लगता था जैसे त्योहार।
अब यादों के झरोखे में झाँकें,
तो मन बचपन के आँगन में भागे।
वो मासूमियत, वो नटखट अंदाज़,
कितना सुहाना था बचपन का साज़।


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