मदर टेरेसा : मानवता की सच्ची सेविका

26 अगस्त, 1910 को  मदर टेरेसा का जन्म स्कोप्जे, मैसेडोनिया में एग्नेस गोंक्सा बोजाक्सिउ के नाम से हुआ था। मदर टेरेसा को उनके द्वारा समाज के लिए किये हुए कार्यों के लिए नोबेल पुरस्कार और वर्ष 1962 में पद्म श्री जैसे कई बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया का चुका है. सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि उन्हें दुनिया भर के कई बड़े और सम्मानित पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। 1964 में भारत दौरे के दौरान पोप पॉल पंचम ने अपनी गाड़ी उन्हें भेंट की थी, लेकिन मदर टेरेसा अपने जीवन को पूरी तरह से जरूरतमंदों की सेवा के लिए समर्पित कर चुकी थीं।

मदर टेरेसा जो एक कैथोलिक नन थीं, उन्होनें अपना पूरा जीवन गरीबों और बीमारों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। उन्हें मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया था, मदर टेरेसा ने  वर्ष 1950 में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी की स्थापना की थी. 

मदर टेरेसा 18 साल की उम्र में ही 'सिस्टर्स ऑफ लोरेटो' में शामिल होने के लिए आयरलैंड चली गईं, जहाँ उन्होंने अंग्रेजी सीखी।  1929 में, वह भारत आईं और कोलकाता के स्कूलों में नन और शिक्षिका के रूप में काम करना शुरू किया। 

उन्होंने 1950 में कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी की स्थापना की, जो बीमार, गरीब और बेघर लोगों की मदद के लिए समर्पित महिलाओं का एक समूह है। 

सम्मान और पुरस्कार
उन्हें उनके मानवतावादी कार्यों के लिए कई सम्मान मिले। 1979 में, उन्हें पीड़ित मानवता की सेवा के लिए नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे उन्होंने गरीबों की मदद के लिए दान कर दिया। भारत सरकार ने उन्हें 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' प्रदान किया। 

विरासत 
मदर टेरेसा का निधन 5 सितंबर, 1997 को हो गया, लेकिन उनकी विरासत आज भी दुनिया भर में मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी की करीब 4500 ननों के साथ जारी है।उन्हें आज भी 20वीं सदी की सबसे महान मानवतावादियों में से एक माना जाता है।

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