"विघ्नहर्ता गणेश की जन्मकथा"

गणेश चतुर्थी, भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। यह हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को पड़ती है। इसे विशेष रूप से महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और गुजरात में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है।
कथा:
एक समय की बात है, माता पार्वती, भगवान शिव की पत्नी, अपने घर में स्नान कर रही थीं। स्नान के बाद उन्होंने सोचा कि कोई उनका पालनहार बने और घर की रक्षा करे। इसलिए उन्होंने अपने शरीर की मिट्टी से एक सुंदर बालक का निर्माण किया और उसे जीवन दिया। वह बालक बहुत ही बुद्धिमान और सौम्य था। माता पार्वती ने उसे आदेश दिया:
"मेरे बिना किसी को घर में प्रवेश न करने देना।"
इसी समय, भगवान शिव घर लौटे। गणेश ने अपनी माँ का आदेश याद रखते हुए शिव जी को घर में प्रवेश करने से रोक दिया। भगवान शिव क्रोधित हुए और उनकी शक्ति से गणेश का सिर काट दिया।
जब माता पार्वती ने यह देखा, तो वे अत्यंत दुखी हुईं और रोने लगीं। उन्होंने कहा,
"हे शिव! मेरे पुत्र को जीवित करो।"
भगवान शिव ने प्राणों को वापस लाने का उपाय खोजा। पास में उनका पहला जीव हाथी था। उन्होंने हाथी का सिर काट कर गणेश के शरीर पर लगा दिया। इस प्रकार गणेशजी का हाथी का सिर बन गया।
भगवान शिव और माता पार्वती दोनों प्रसन्न हुए और गणेशजी को आशीर्वाद दिया। भगवान शिव ने कहा:
"तुम सभी बाधाओं और विघ्नों को हराने वाले बनोगे। लोग तुम्हारी पूजा करके अपने कार्यों में सफलता पाएंगे।"
इस घटना के बाद गणेशजी को विघ्नहर्ता (बाधाओं को दूर करने वाला) और बुद्धि, ज्ञान और धन के देवता के रूप में पूजा जाने लगा।
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