“अमृता प्रीतम: एक स्त्री की कलम से निकली दुनिया”
अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को हुआ था। वो भारतीय साहित्य की महान और अग्रणी पंजाबी कवयित्री, उपन्यासकार और लेखिका थीं। उन्हें पंजाबी साहित्य की पहली प्रमुख महिला कवयित्री माना जाता है। उनकी रचनाओं में स्त्री-जीवन के संघर्ष, प्रेम, पीड़ा, सामाजिक अन्याय और मानवीय संवेदनाओं का गहरा चित्रण मिलता है।
उन्होंने लगभग 100 से अधिक किताबें लिखीं जिनमें कविता-संग्रह, उपन्यास, आत्मकथाएँ और निबंध शामिल हैं। पिंजर उनका प्रसिद्ध उपन्यास है, जिस पर आधारित फिल्म ने भी ख्याति पाई। विभाजन की त्रासदी को लेकर लिखी गई उनकी कविता “आज आख़ाँ वारिस शाह नूँ” आज भी उस दौर की सबसे मार्मिक अभिव्यक्ति मानी जाती है।
अमृता प्रीतम को साहित्य अकादमी पुरस्कार (1956) प्राप्त करने वाली पहली महिला लेखिका होने का गौरव प्राप्त है। इसके अतिरिक्त उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार (1981), पद्मश्री और पद्म विभूषण जैसे सम्मान भी मिले।
उनकी आत्मकथा “रसीदी टिकट” भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उन्होंने अपने जीवन, संघर्ष और निजी भावनाओं को स्पष्टता से व्यक्त किया है।
अमृता प्रीतम ने न सिर्फ पंजाबी साहित्य को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई, बल्कि महिलाओं की आवाज़ को साहित्यिक मंच पर स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। अमृता प्रीतम की मृत्यु 31 अक्टूबर 2005 को हुई।
पेश है अमृता प्रीतम द्वारा लिखी हुई कविता- पहचान
तुम मिले
तो कई जन्म
मेरी नब्ज़ में धड़के
तो मेरी साँसों ने तुम्हारी साँसों का घूँट पिया
तब मस्तक में कई काल पलट गए--
एक गुफा हुआ करती थी
जहाँ मैं थी और एक योगी
योगी ने जब बाजुओं में लेकर
मेरी साँसों को छुआ
तब अल्लाह क़सम!
यही महक थी जो उसके होठों से आई थी--
यह कैसी माया कैसी लीला
कि शायद तुम ही कभी वह योगी थे
या वही योगी है--
जो तुम्हारी सूरत में मेरे पास आया है
और वही मैं हूँ... और वही महक है...
- अमृता प्रीतम


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