अस्तित्व-एक कविता

मैं हूँ, यह अहसास मेरा,

सन्नाटों में भी है मेरी झंकार।
हर धड़कन, हर सांस में बसा,
मैं हूँ, मेरी पहचान का आधार।

समय की लहरों में बहता,
पर अपनी छाया को नहीं खोता।
सपनों की कच्ची परियों सा,
मैं हूँ, मैं अपने भीतर की रोशनी को पोता।

कभी खामोशी की चादर में छुपा,
कभी तूफानों में संघर्ष करता।
पर मैं हूँ, मैं अस्तित्व का स्वर,
जो हर पल अनन्त से करता सामना।

मैं नहीं बस नाम या रूप,
मैं विचार, मैं भावना, मैं अनुभव।
जड़ों में भी, ऊँचाइयों में भी,
मैं हूँ, मैं हूँ… मैं हूँ अस्तित्व का प्रतीक।

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