हिंदी साहित्य और रंगमंच के जनक – भारतेंदु हरिश्चंद्र
हिंदी साहित्य का आधुनिक युग जिस महान विभूति से प्रारंभ होता है, वे हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र। 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में जन्मे भारतेंदु जी ने अपने अल्पायु जीवन (केवल 34 वर्ष) में साहित्य, पत्रकारिता और रंगमंच की जो नींव रखी, उसने हिंदी को नई पहचान और नई दिशा दी। उन्हें साहित्य-जगत में “आधुनिक हिंदी साहित्य और रंगमंच का जनक” तथा “भारतेंदु युग” का प्रवर्तक कहा जाता है।
जीवन परिचय
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ। बचपन से ही उनमें साहित्यिक प्रतिभा के लक्षण दिखाई देने लगे थे। संस्कृत, ब्रजभाषा और अंग्रेज़ी का गहरा ज्ञान प्राप्त कर उन्होंने अपनी लेखनी को समाज-सुधार और राष्ट्रीय चेतना जगाने का माध्यम बनाया।
कविता और नाटक –भारतेंदु जी ने काव्य और नाट्य दोनों क्षेत्रों में अमिट छाप छोड़ी। उनका नाटक “अंधेर नगरी चौपट राजा” आज भी प्रासंगिक है और सत्ता तथा भ्रष्टाचार पर गहरा व्यंग्य प्रस्तुत करता है।
पत्रकारिता –उन्होंने “कविवचनसुधा” और “हरिश्चंद्र मैगज़ीन” जैसे पत्रों का प्रकाशन कर हिंदी पत्रकारिता को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया। उनके संपादकीय लेख तत्कालीन समाज, राजनीति और अंग्रेज़ी शासन पर करारी चोट करते थे।
हिंदी भाषा का विकास –भारतेंदु जी ने खड़ी बोली हिंदी को साहित्य और रंगमंच की भाषा बनाया। इस कार्य ने हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पेश है भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविताएं
1.नैन भरि देखौ गोकुल-चंद
नैन भरि देखौ गोकुल-चंद नैन भरि देखौ गोकुल-चंद
श्याम बरन तन खौर बिराजत अति सुंदर नंद-नंद
विथुरी अलकैं मुख पै झलकैं मनु दोऊ मन के फंद
मुकुट लटक निरखत रबि लाजत छबि लखि होत अनंद
संग सोहत बृषभानु-नंदिनी प्रमुदित आनंद-कंद
'हरीचंद' मन लुब्ध मधुप तहं पीवत रस मकरंद
2. होली
कैसे करें कैसी होरी खिलाई।
आग तन-मन में लगाई॥
पानी की बूँदी से पिंड प्रकट कियो सुंदर रूप बनाई।
पेट अधम के कारन मोहन घर-घर नाच नचाई॥
तबौ नहिं हबस बुझाई। भूँजी भाँग नहीं घर भीतर, का पहिनी का खाई।
टिकस पिया मोरी लाज का रखल्यो, ऐसे बनो न कसाई॥
तुम्हें कैसर दोहाई।


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