“उत्तराखंड की जनआवाज़: गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’”
10 सितंबर 1945 को अल्मोड़ा जनपद में जन्मे गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ उत्तराखंड के उन जनकवियों में गिने जाते हैं, जिन्होंने अपनी कलम और आवाज़ से समाज को आंदोलनों की राह दिखाई। वे केवल कवि या लोकगायक ही नहीं थे, बल्कि एक सच्चे जनसैनिक थे, जिनकी रचनाएँ पहाड़ की वेदना, संघर्ष और उम्मीदों की जीवंत अभिव्यक्ति बन गईं।
गिर्दा का जन्म कुमाऊँ अंचल में हुआ और यहीं से उन्होंने अपनी संवेदनाओं और लोकधुनों को संजोया। पढ़ाई के दौरान ही साहित्य और रंगमंच में उनकी गहरी रुचि बनी। बाद में वे गीत-संगीत और लेखन के माध्यम से सामाजिक मुद्दों से जुड़े।
जन-आंदोलनों की आवाज़
- गिर्दा का नाम उत्तराखंड के तमाम आंदोलनों के साथ जुड़ा है।
- चिपको आंदोलन में उनके गीतों ने जंगल बचाने की लड़ाई को और सशक्त किया।
- “नशा नहीं, रोज़गार दो” आंदोलन में उनकी कविताएँ युवाओं का घोष बन गईं।
उनकी लेखनी ने आंदोलनों को सिर्फ नारा नहीं दिया, बल्कि उसे सांस्कृतिक आधार भी प्रदान किया।
साहित्य और रचनाएँ
गिर्दा ने लोकधुनों में जनकविता का रंग भरा। उनकी रचनाएँ जैसे—
“ओ जैता एक दिन तो आयगो ऊ दिन यो दुनी में”
“हल चलाना, हल चलाना, खेत हमारा बलद पराया”
आज भी जनसंघर्षों में गाई जाती हैं। उनकी कविताओं और गीतों में पहाड़ के श्रमिक, किसान, स्त्रियाँ और युवाओं की वास्तविक तस्वीर दिखाई देती है।
पेश है उनके द्वारा लिखी हुई कविता– हम लड़ने रयां बैणी
बैणी फाँसी नी खाली ईजा, और रौ नी पड़ल भाई।
मेरी बाली उमर नि माजेलि , दीलि ऊना कढ़ाई।।
मेरी बाली उमर नि माजेलि, तलि ऊना कड़ाई।
रामरैफले लेफ्ट रेट कसी हुछो बतूलो।
हम लड़ते रयां बैणी , हम लड़ते रूलो।
हम लड़ते रया भुला, हम लड़ते रूलो।।
अर्जुनते कृष्ण कुछो, रण भूमि छो सारी दूनी तो।
रण बे का बचुलो , हम लड़ते रया बैणी हम लड़ते रूलो
हम लड़ते रया भुला, हम लड़ते रूलो।।
धन माएड़ि छाती, उनेरी धन तेरा ऊ लाल।
बलिदानकी जोत जगे, खोल गे उज्याल।।
खटीमा, मसूरी मुजेफरें कें, हम के भूलि जूलो।
हम लड़ते रयां बैणी , हम लड़ते रूलो।
हम लड़ते रुला, चेली हम लड़ते रूलो।।
कस होलो उत्तराखंड, कस हमारा नेता।
कसी होली विकास नीति, कसी होली ब्यवस्था।।
जड़ी कंजड़ी उखेलि भलीके , पूरी बहस करूलो।
हम लड़ते रयां बैणी , हम लड़ते रूलो।
सांच नि मराल झुरी झुरी पा, झूठी नि डोरी पाला।
लिस , लकड़ा, बजरी चोर जा नि फौरी पाला।।
जाधिन ताले योस नि है जो, हम लड़ते रूलो।
हम लड़ते रयां बैणी , हम लड़ते रूलो।
मैसन हूँ, घर कुड़ी हो भैसन हु खाल।
गोर बछन हु चरुहू हो, चाड़ पौथन हूँ डाल।।
धुर जंगल फूल फूलों, यस मुलुक बनुलो ।
हम लड़ते रयां बैणी , हम लड़ते रूलो।
हम लड़ते रूलो भूलि, हम लड़ते रूलो।।
हम लड़ते रयां दीदी, हम लड़ते रूलो।।


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