“सिनेमा और साहित्य के सशक्त लेखक: प्रसून जोशी”
प्रसून जोशी अपने समय और भाषाई परिप्रेक्ष्य में अद्वितीय योगदान के लिए जाने जाते हैं। इन्होनें हिंदी कविता और सिनेमा के माध्यम से समाज को प्रेरित किया, प्रसून जोशी भारतीय सिनेमा और साहित्य के क्षेत्र में एक बहुआयामी प्रतिभा हैं।
प्रसून जोशी का जन्म 16 सितंबर को हुआ था। वे एक प्रसिद्ध कवि, लेखक, पटकथा लेखक और गीतकार हैं। उन्हें विशेष रूप से हिंदी फिल्मों के गीतों के लिए जाना जाता है। उनकी कविताओं और गीतों में गहरी सोच, सामाजिक संदेश और भावनात्मक परिपक्वता दिखाई देती है।
वे विज्ञापन उद्योग में भी एक महत्वपूर्ण नाम हैं और कई चर्चित विज्ञापनों के लिए उनकी लेखनी को सराहा गया है। उनकी शैली में सरलता के साथ-साथ अर्थपूर्ण गहराई भी मिलती है, जो उन्हें अन्य लेखकों और गीतकारों से अलग बनाती है।
उनके कुछ प्रसिद्ध गीतों और कामों में शामिल हैं:
फ़िल्में जैसे भाग मिल्खा भाग, तारे ज़मीन पर, और चक दे! इंडिया में उनके गीतों ने लोगों के दिलों को छुआ।
उनकी कविताएँ और शॉर्ट स्टोरीज़ भी साहित्यिक जगत में सराही गई हैं।
आईये पढ़ते है उनके द्वारा लिखी हुई कविता- "मन के मंजीरे"
मन के मंजीरे आज
खनकने लगे
भूले थे चलना
क़दम थिरकने लगे
अंग-अंग बाजे मृदंग-सा
सुर मेरे जागे
साँस-साँस में, बाँस-बाँस में
धुन कोई साजे
गाए रे, दिल ये गाने लगा है
मुझको आने लगा है
ख़ुद पे ही एतबार
ख़ुद पे ही एतबार
बादल तक झूले मेरे
पहुँचने लगे
आँखों के आगे गगन
सिमटने लगे
गाल गाल पे, ताल ताल दे
छू के हवाएँ
खेत खेत ने, रेत रेत ने
फैला दी बाँहें
आई रे, सिंदूरी सुबह आई
घुलती जाए स्याही
रातों की, रातों की
रातों की, रातों की
खोले जो दरवाज़े तो देखा
हर शै थी नहाई
उजली-उजली-सी थी मेरी तन्हाई रे
बदली-बदली-सी बदली
मेरे अँगना में थी छाई
वीरानी रानी बनके मेरे पास आई
अपनी नज़र से मैंने देखी
दुनिया की रंगोली
मुझको बुलाने आई मौसम की टोली
खोली आँखों की खोली
मैंने पाई अपनी बोली
मुझमें ही रहती थी मेरी हमजोली रे
सुन लो, अब न अकेली हूँ मैं
अपनी सहेली हूँ मैं
साथी हूँ अपनी मैं
मन के मंजीरे आज
खनकने लगे
भूले थे चलना
क़दम थरकने लगे
अंग-अंग बाजे मृदंग-सा
सुर मेरे जागे
साँस-साँस से, बाँस-बाँस में
धुन कोई साजे
गाए रे, दिल ये गाने लगा है
मुझको आने लगा है
ख़ुद पे ही एतबार
ख़ुद पे ही एतबार
बादल तक झूले मेरे
पहुँचने लगे
आँखों के आगे गगन
सिमटने लगे
गाल-गाल पे, ताल-ताल दे
छू के हवाएँ
खेत खेत ने, रेत रेत ने
फैला दी बाँहें
आई रे, सिंदूरी सुबह आई
घुलती जाए स्याही
रातों की, रातों की
रातों की, रातों की


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