जगदानंद रॉय: बंगाली विज्ञान कथा के अग्रणी लेखक

जगदानंद रॉय का जन्म 1869 में हुआ था। वे उस समय के लेखक थे जब विज्ञान की खोजें और औद्योगिक क्रांति ने समाज में एक नई उत्सुकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जन्म दिया था। रॉय का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि पाठकों में वैज्ञानिक चेतना और तार्किक सोच को प्रोत्साहित करना भी था।

बंगाली साहित्य में विज्ञान कथा के प्रारंभिक स्तंभों में से एक माने जाते हैं। वे उस समय के लेखक थे जब विज्ञान और तकनीकी खोजों ने समाज में नई उत्सुकता और कल्पना जगाई थी। रॉय ने अपनी लेखनी के माध्यम से पाठकों को वैज्ञानिक विचारों और कल्पनाओं की दुनिया से परिचित कराया।

रचनाएँ और योगदान
रॉय की सबसे प्रसिद्ध रचना "Shukra Bhraman" (शुक्र भ्रमण) है, जो एक रोचक विज्ञान कथा है। इस कहानी में उन्होंने अंतरिक्ष यात्रा की कल्पना की और शुक्र ग्रह पर जीवन के अस्तित्व की परिकल्पना प्रस्तुत की। इस रचना को बंगाली साहित्य की पहली विज्ञान कथा कहानियों में से एक माना जाता है।

उनकी कहानियों की विशेषता यह थी कि वे केवल कल्पनाशील नहीं थीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कों पर आधारित थीं। इसने बंगाली साहित्य में विज्ञान कथा को एक गंभीर विधा के रूप में स्थापित करने में मदद की।

उन्होंने विज्ञान पर कई पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें प्रकृतिकी परिकेय, विज्ञानाचार्य जगदीस बसुर अबिस्कर, वैज्ञानिकी, प्रकृतिकी, ज्ञानसोपन, ग्रहनक्षत्र, पोकमकाड (कीड़ों पर), विजनानेर गल्पा, गछपाला, माच-ब्यांग-सैप, शब्दा, पाखी (पक्षियों पर), नक्षत्रसेना (सितारों पर) शामिल हैं।

महत्व और प्रभाव
जगदानंद रॉय ने साहित्य के माध्यम से विज्ञान के प्रति जिज्ञासा को बढ़ावा दिया। उन्होंने विज्ञान को केवल प्रयोगशाला तक सीमित न रखकर उसे आम पाठकों के लिए रोचक और सुलभ बनाया। उनके योगदान ने बाद के बंगाली विज्ञान कथा लेखकों जैसे सत्यजीत रे और प्रेमेन्द्र मित्र को भी प्रेरित किया।

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