वो वक़्त ही क्या – कुछ पल ऐसे होते हैं, जो गुजर जाते हैं
"कुछ पल ऐसे होते हैं, जो गुजर जाते हैं पर हमारी यादों में हमेशा जीवित रहते हैं… वो वक़्त ही क्या,कविता इसी पल को दर्शाता है-पेश है कविता " वो वक़्त ही क्या"
वो वक़्त ही क्या, जो बस बीत जाए?
जो आँखों के सामने से फिसलकर छुप जाए?
वो पल जब हँसी में रंग होते थे,
और आंसू भी चुपचाप मुस्कुराते थे।
वो वक़्त ही क्या, जो संग चलता रहे?
हर मोड़ पे हाथ थामे, और दिलों में बसे?
छोटी छोटी खुशियाँ, अनकहे सपने,
और अधूरी बातें, जो कभी कह ना पाए।
वो वक़्त ही क्या, जो लौटकर न आए,
पर यादों की किताब में बसते जाएँ।
हर गली, हर छाँव, हर बारिश की बूंद,
कुछ कहती है, कुछ सुनाती है, और कुछ बस याद दिलाती है।
वो वक़्त ही क्या, अगर हम उसे महसूस करें?
हर हँसी, हर आँसू, हर सपना, हर फ़िक्र,
सब कुछ हमारे दिल की गहराई में बसा रहे।
और फिर भी, वह गुजर जाता है,
जैसे नदी की लहरें, किनारे को चूमकर बह जाएँ।
वो वक़्त ही क्या, जो हमारी कहानी नहीं बन पाए?
हर मोड़ पे मिली वो मुस्कान,
हर राह में छुपा वो प्यार,
हर रात की तन्हाई में गूँजता वो गीत।
और जब हम पीछे मुड़कर देखें,
तब समझ आएगा –
वो वक़्त ही क्या, जो बीत गया?
असल में वो तो हमने जी लिया,
हर पल, हर एहसास, हर ख्वाब में।
क्योंकि वक़्त ही क्या, अगर यादें हमारे साथ हैं,
और हम उन्हें अपने दिल में बसाकर जीते हैं।


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