भगवतीचरण वर्मा की कविता - "तुम अपनी हो, जग अपना है"
भगवतीचरण वर्मा (30 अगस्त 1903 – 5 अक्टूबर 1981) हिंदी साहित्य के एक प्रमुख लेखक, कवि और पत्रकार थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गाँव में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री प्राप्त की। प्रारंभ में कविता लेखन से शुरुआत करने वाले वर्मा जी बाद में उपन्यासकार के रूप में विख्यात हुए। उनकी काव्य रचनाएँ छायावादी प्रवृत्तियों से प्रभावित थीं।
उनका प्रसिद्ध उपन्यास 'चित्रलेखा' 1934 में प्रकाशित हुआ, जो प्रेम, नैतिकता और दर्शन के विषयों पर आधारित है। इस उपन्यास पर दो बार फिल्में भी बनीं। 'भूले-बिसरे चित्र' नामक उनके पांच खंडों वाले उपन्यास को 1961 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1971 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 1978 में उन्हें राज्यसभा की मानद सदस्यता भी प्राप्त हुई।
उनके द्वारा लिखी हुई कविताएँ प्रेम, प्रकृति और जीवन के गहरे भावनात्मक पहलुओं को उजागर करती हैं। उनकी कविता "तुम अपनी हो, जग अपना है" विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जिसमें प्रेम और अधिकार के विषयों पर विचार किया गया है। आईये पढ़ते हैं कविता- "तुम अपनी हो, जग अपना है"
तुम अपनी हो, जग अपना है
किसका किस पर अधिकार प्रिये
फिर दुविधा का क्या काम यहाँ
इस पार या कि उस पार प्रिये।
देखो वियोग की शिशिर रात
आँसू का हिमजल छोड़ चली
ज्योत्स्ना की वह ठण्डी उसाँस
दिन का रक्तांचल छोड़ चली।
चलना है सबको छोड़ यहाँ
अपने सुख-दुख का भार प्रिये,
करना है कर लो आज उसे
कल पर किसका अधिकार प्रिये।
है आज शीत से झुलस रहे
ये कोमल अरुण कपोल प्रिये
अभिलाषा की मादकता से
कर लो निज छवि का मोल प्रिये।
इस लेन-देन की दुनिया में
निज को देकर सुख को ले लो,
तुम एक खिलौना बनो स्वयं
फिर जी भर कर सुख से खेलो।
पल-भर जीवन, फिर सूनापन
पल-भर तो लो हँस-बोल प्रिये
कर लो निज प्यासे अधरों से
प्यासे अधरों का मोल प्रिये।
सिहरा तन, सिहरा व्याकुल मन,
सिहरा मानस का गान प्रिये
मेरे अस्थिर जग को दे दो
तुम प्राणों का वरदान प्रिये।
भर-भरकर सूनी निःश्वासें
देखो, सिहरा-सा आज पवन
है ढूँढ़ रहा अविकल गति से
मधु से पूरित मधुमय मधुवन।
यौवन की इस मधुशाला में
है प्यासों का ही स्थान प्रिये
फिर किसका भय? उन्मत्त बनो
है प्यास यहाँ वरदान प्रिये।
देखो प्रकाश की रेखा ने
वह तम में किया प्रवेश प्रिये
तुम एक किरण बन, दे जाओ
नव-आशा का सन्देश प्रिये।
अनिमेष दृगों से देख रहा
हूँ आज तुम्हारी राह प्रिये
है विकल साधना उमड़ पड़ी
होंठों पर बन कर चाह प्रिये।
मिटनेवाला है सिसक रहा
उसकी ममता है शेष प्रिये
निज में लय कर उसको दे दो
तुम जीवन का सन्देश प्रिये।


No Previous Comments found.