लघु कथा "उम्मीद"-छोटे कदम भी बदलाव लाते हैं
रवि की नौकरी चली गई थी। तीन महीने से वह रोज़ नए विज्ञापन देखता, रिज़्यूमे भेजता, पर कोई जवाब नहीं आता।घर में माहौल भारी था, और बेटी पूजा हर सुबह पूछती, “पापा, आज काम नहीं है?”
रवि बस मुस्कुराता, “नहीं बेटा।”
एक दिन वह पार्क में बैठा था। पास में एक बच्चा मिट्टी से घर बना रहा था।घर गिर जाता, बच्चा फिर से बनाता।रवि ने पूछा,“इतनी बार गिरने के बाद भी?”बच्चे ने हँसते हुए कहा,“अंकल, सूरज फिर से निकलता है ना।”
वो बात रवि के दिल में उतर गई।घर लौटकर उसने अपनी पुरानी आइडियाज़ पर काम करना शुरू किया।कुछ महीनों में उसकी छोटी सर्विस सफल हो गई।
रवि समझ गया — जब तक सूरज है, उम्मीद भी है।
सीख: “कठिनाइयों में भी उम्मीद मत खोओ, लगातार प्रयास करते रहो, सफलता जरूर मिलेगी।


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