कविता-सर्दियों की शुरुआत
धीरे-धीरे धूप का आँचल सरक गया,
हवा में ठंड का पहला झोंका भरक गया।
पेड़ों ने ओढ़ ली चांदी सी चादर,
धूप भी अब बन गई है आलसी-बेअसर।
सुबह की चाय की खुशबू महकती है,
धुंध में लिपटी गली कुछ कहती है।
काँपते हाथों में गरम कप की ऊष्मा,
दे जाती है दिल को नयी सी भावना।
ओस की बूँदों में चमकते हैं मोती,
सूरज भी झाँके धीरे-धीरे, छोटा रोज़ का साथी।
नीले आसमान पर सफ़ेद रुई के बादल,
मानो किसी चित्रकार ने खींचे हों सांवल।
बच्चे दौड़ते हैं स्वेटर पहन कर,
दादी कहती हैं — “अब रज़ाई में रह कर।”
आँगन में गुनगुनाती है धूप सुनहरी,
सर्दी की शुरुआत, कितनी सुहानी, कितनी प्यारी।


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