लघु कथा: पेड़ और लकड़हारा

एक घने जंगल के किनारे एक बड़ा पेड़ था। उसकी छाया में रोज़ एक लकड़हारा आराम किया करता था।

पेड़ उसे देख खुश होता और बोला करता,
“आराम कर लो बेटे, धूप बहुत तेज़ है।”

लकड़हारा रोज़ उससे बातें करता, पर एक दिन उसके मन में लालच आ गया।
उसने सोचा, “अगर मैं इसकी डालियाँ काट लूँ तो इन्हें बेचकर पैसे मिल जाएंगे।”
उसने पेड़ की डालियाँ काट दीं।

पेड़ कुछ नहीं बोला।
कुछ दिनों बाद लकड़हारे ने उसका तना भी काट दिया।
अब पेड़ बस ठूँठ रह गया।

वर्षों बाद वही लकड़हारा बूढ़ा होकर लौटा।
चलने की ताकत नहीं बची थी, तो वह पेड़ के ठूँठ पर बैठ गया।

पेड़ ने धीमे से कहा,
“आ जा बेटे, मैं अब भी तुझे सहारा दे सकता हूँ।”

लकड़हारा आँसू भरकर बोला,
“तू बूढ़ा हुआ, मैं भी बूढ़ा हुआ… पर तू आज भी मुझे आराम दे रहा है।”

सीख: जो दूसरों को सुख देता है, वह कभी व्यर्थ नहीं जाता।
सच्चा प्रेम और सेवा बिना शर्त होती है।

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