लघु कथा: “माँ की चप्पलें”

रवि एक गरीब परिवार से था। उसके पिता नहीं थे, और उसकी माँ लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा कर, बर्तन माँजकर, किसी तरह घर चलाती थी।

हर सुबह वह रवि का टिफिन बनाती, उसे प्यार से जगाती और खुद भूखी रहकर भी उसे स्कूल भेजती थी।

बरसात का मौसम आया। रास्ते में कीचड़ भरा रहता, और रवि के पुराने जूते अब टूट चुके थे।
रवि ने उदास होकर कहा, “माँ, मेरे जूते फट गए हैं, स्कूल कैसे जाऊँ?”

माँ ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बेटा, चिंता मत कर, मैं कुछ सोचती हूँ।”

अगले दिन माँ ने अपनी पुरानी चप्पल धोकर रवि को दीं।
रवि खुश हो गया और स्कूल चला गया। पर जब वह लौटा, तो देखा कि माँ के पैरों में कीचड़ और काँटों के निशान थे।

रवि ने हैरानी से पूछा, “माँ, तुम्हारी चप्पल कहाँ गई?”
माँ हँसकर बोली, “बेटा, मेरे पैर अब इन चप्पलों में नहीं आते। तुझे पहनने के लिए ही तो दी थीं।”

रवि कुछ नहीं बोला, पर उस दिन उसने समझ लिया कि माँ के पैर नहीं, उनका दिल बड़ा था।
वह अपना सुख, अपनी सुविधा, यहाँ तक कि अपने शरीर का दर्द भी बेटे के भविष्य के लिए भूल गई थी।

शिक्षा:
माँ वह है जो खुद भूखी रहकर बच्चे को खिलाती है, खुद भीगकर उसे सूखा रखती है, और खुद थककर भी मुस्कुराती है।उसका प्रेम सबसे पवित्र, सबसे निःस्वार्थ और सबसे महान होता है।माँ का त्याग ही सच्चे प्रेम की परिभाषा है।

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