बाल दिवस पर विशेष कविताएं: चाचा नेहरू और बच्चों का उत्सव

बाल दिवस हर वर्ष 14 नवंबर को मनाया जाता है। यह दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के जन्मदिन की स्मृति में मनाया जाता है। नेहरू जी बच्चों से अपार प्रेम करते थे, इसलिए बच्चे उन्हें स्नेहपूर्वक ‘चाचा नेहरू’ कहते थे।

यह दिन बच्चों के अधिकारों, उनके सपनों, और खुशियों का उत्सव है। इस अवसर पर विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से बच्चों की प्रतिभा और रचनात्मकता को प्रोत्साहित किया जाता है।

प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘चांद का कुर्ता’ में मां और बच्चे के स्नेहिल संबंध को बड़ी सुंदरता से दर्शाया गया है। इसी तरह हरिवंश राय बच्चन, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और अन्य महान कवियों ने भी अपनी कविताओं में बच्चों की मासूमियत, जिज्ञासा और उज्ज्वल भविष्य का चित्रण किया है।

नीचे पेश है 5 ऐसी कविताएं जिसमें छुपा है हर बच्चे के भविष्य का एक सुंदर सपना , जिसे प्यार, शिक्षा और सहयोग से साकार किया जा सकता है।


1.सबसे पहले / हरिवंशराय बच्चन
आज उठा मैं सबसे पहले!
सबसे पहले आज सुनूँगा,
हवा सवेरे की चलने पर,
हिल, पत्तों का करना ‘हर-हर’
देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले,
लाल, सुनहले!

आज उठा मैं सबसे पहले!
सबसे पहले आज सुनूँगा,
चिड़िया का डैने फड़का कर
चहक-चहककर उड़ना ‘फर-फर’
देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले,
लाल सुनहले!

आज उठा मैं सबसे पहले!
सबसे पहले आज चुनूँगा,
पौधे-पौधे की डाली पर,
फूल खिले जो सुंदर-सुंदर
देखूँगा, पूरब में फैले बादल पीले?
लाल, सुनहले

आज उठा मैं सबसे पहले!
सबसे कहता आज फिरूँगा,
कैसे पहला पत्ता डोला,
कैसे पहला पंछी बोला,
कैसे कलियों ने मुँह खोला
कैसे पूरब ने फैलाए बादल पीले,
लाल, सुनहले!

आज उठा मैं सबसे पहले!

2.मेले में लल्ला / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
कलकत्ते में खो गए लल्ला
कहीं अगाड़ी, कहीं पुछल्ला
घर में बैठे वे चुपचाप
करते रामनाम का जाप
भागे सुन मेले का हल्ला
कहीं अगाड़ी कहीं पुछल्ला
कलकत्ते में खो गए लल्ला 
                                
मेले में हाथी-घोड़े
थोड़े जोड़े, शेष निगोड़े
इतनी भीड़ की अल्ला-अल्ला
कहीं अगाड़ी कहीं पुछल्ला
कलकत्ते में खो गए लल्ला
इधर तमाशा उधर रमाशा
रंग-बिरंगा शी-शी-शा-शा

बहु बाज़ार औ’ आगरतल्ला
कहीं अगाड़ी कहीं पुछल्ला
कलकत्ते में खो गए लल्ला 
चौरंगी पर खा नारंगी
चले बोलकर जय बजरंगी
हक्के-बक्के साथ न संगी
भूल गए मानिक तल्ला
कहीं अगाड़ी कहीं पुछल्ला
कलकत्ते में खो गए लल्ला 

3.गाँधीजी के बन्दर तीन / बालस्वरूप राही
गाँधीजी के बन्दर तीन,
सीख हमें देते अनमोल ।

बुरा दिखे तो दो मत ध्यान,
बुरी बात पर दो मत कान,
कभी न बोलो कड़वे बोल ।

याद रखोगे यदि यह बात ,
कभी नहीं खाओगे मात,
कभी न होगे डाँवाडोल ।

गाँधीजी के बन्दर तीन,
सीख हमें देते अनमोल ।

4.चंदा मामा / अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
चंदा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ।
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ।

मैं तैरा मृग-छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा।
उसकी उछल-कूद देखूँगा,
उसको चाटूँगा-चूमूँगा।


5.चांद का कुर्ता / रामधारी सिंह 'दिनकर'

हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
सिलवा दो मां मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

आसमान का सफ़र और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।

घटता-बढ़ता रोज़ किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आंखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएं,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए।

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