बालकृष्ण भगवन्त बोरकर की कविता - बारह मास एक ही क्षण में
बालकृष्ण भगवन्त बोरकर (1910–1984), जिन्हें प्यार से 'बा-कि-बाब' के नाम से जाना जाता है, गोवा के एक प्रतिष्ठित कोंकणी कवि थे। वे कोंकणी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अपनी रचनाओं के लिए विख्यात हुए। बोरकर ने समाज, संस्कृति और मानवीय भावनाओं को अपनी कविताओं में सुंदरता और गहराई के साथ उकेरा। उनके कविता–संग्रह ससया के लिए उन्हें 1981 में कोंकणी भाषा में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका साहित्यिक योगदान गोवा और कोंकणी साहित्य को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण रहा है।
उनके द्वारा लिखी हुई बारह मास एक सुंदर कविता है जिसमें साल के बारह महीनों का वर्णन कवि ने बड़े ही सरल और रोचक ढंग से किया है। यह कविता पाठकों को हमारे पारंपरिक भारतीय कैलेंडर के महीनों और उनमें होने वाले विभिन्न त्योहारों तथा मौसम के बदलावों से परिचित कराती है। पेश है कविता - "बारह मास एक ही क्षण में"
चित्रों को पुष्पित करता हुआ चैत्र
तुम्हारी देह की मादकता बनता है,
और वैशाख वक्षस्थल में फलित होकर
नई गंध फैलाता है।
जेठ ने तुम्हारे अंगों में
कोमल जुही की मृदुता भर दी,
और आषाढ़ ने
आँखों में भर दी गीली काजल की रातें।
सावन ने तेरे मुखड़े पर
धूप और बरखा की जाली उढ़ा दी,
और भादो ने रोम-रोम में भर दिया
नए अंकुरों का उन्मेष।
तेरे शब्दों में आश्विन के नभ का
चमत्कार समाया है,
और हाव-भावों में
कार्तिक करता है शृंगार।
तेरी गति की भव्यता में
मार्गशीर्ष का बड़प्पन है,
और मोहक लावण्य में
पौष की चाँदनी की शांत स्निग्धता।
तेरे स्पर्श में
माघ के हृदय का आकर्षण,
और तेरी ख़ुशियों में
फागुन बिखेरता है संध्या के रंग।
तेरे कारण एक ही क्षण में
बारह मासों का आलिंगन संभव बनता है,
और संपूर्ण सृष्टि का सौंदर्य
पीता हूँ
अधरों के यौवन में।
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