लघुकथा — आख़िरी मिठाई
त्योहार वाली दोपहर थी। घर मिठाई की खुशबू से भरा था। मेज पर रखा डिब्बा लगभग खाली हो चुका था—बस एक ही मिठाई बची थी। दादी ने डिब्बा बंद करने ही वाली थीं कि तभी उनका छोटा-सा पोता दौड़ता हुआ आया।
“दादी, दादी! आख़िरी मिठाई कहाँ है? मुझे वही चाहिए!”
दादी मुस्कुराईं—“अरे, यही तो बची है। ले लो।”
पोते ने मिठाई उठा ली, पर खाया नहीं। वह मिठाई को अपनी दोनों हथेलियों में घुमाता रहा—जैसे किसी बड़े फ़ैसले पर सोच रहा हो।
दादी ने पूछा, “क्या हुआ? पसंद नहीं आई?”
पोता धीरे से बोला, “दादी… जब भी आख़िरी मिठाई बचती है, आप सबको दे देती हैं। कभी अपने लिए नहीं रखतीं। आज आप खाइए।”
दादी ने हँसते हुए कहा, “अरे, मैं तो रोज़ खा सकती हूँ। बच्चे के लिए आख़िरी चीज़ ही सबसे प्यारी होती है।”
पोते ने सिर हिलाया, “नहीं दादी, आज यह सबसे प्यारी आपके लिए है… क्योंकि आप ही सबसे प्यारी हो।”
दादी की आँखों में नमी तैर गई।
उन्होंने मिठाई आधी तोड़ी, आधी पोते को दी, आधी खुद खाई।
“देखो,” दादी बोलीं, “प्यार कभी पूरा अकेले नहीं खाया जाता… बाँटने में ही मिठास है।”
पोता उनकी गोद में सिर रखकर बोला—
“और दादी, आख़िरी मिठाई हमेशा उसी को मिलनी चाहिए, जो सभी के लिए पहले सोचता है।”
दादी ने उसे सीने से लगा लिया।
त्योहार की सबसे मीठी चीज़ उस दिन मिठाई नहीं, उनका रिश्ता था।
सीख - ये कहानी दिखाती है कि सच्चा प्यार वह है जो अपने हिस्से की चीज़ भी किसी और को देते हुए खुश होता है।


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