राजकमल चौधरी की कविता - अकाल का पहला दिन
“अकाल का पहला दिन” कविता में कवि अकाल की शुरुआती आहट को चित्रित करते हैं। यह कविता केवल भूख की नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना के सूखने की कविता है। अकाल अभी पूरी तरह आया नहीं है, लेकिन उसके लक्षण दिखने लगे हैं—खामोशी, भय, अनिश्चितता और विवशता।
पहले ही दिन मनुष्य को यह एहसास होने लगता है कि
अब जीवन की प्राथमिकताएँ बदलने वाली हैं—
सपने, प्रेम, सौंदर्य और नैतिकता पीछे छूटने लगते हैं,
और रोटी सबसे बड़ा प्रश्न बन जाती है।
राजकमल चौधरी की कविता की खासियत यह है कि वे कम शब्दों में गहरी चोट करते हैं।कविता का संदेश ये है कि- अकाल केवल पेट नहीं मारता,वह मनुष्य की मानवता, नैतिकता और गरिमा को भी चुनौती देता है। पेश है कविता- “अकाल का पहला दिन”
जब पूरा का पूरा यह शहर
मुज़फ़्फरपुर
खारे पानी में डूब गया
औरत वह बेमिसाल
मीराजी की ग़ज़ल में शीशे के बिखरे हुए—
टुकड़ों पर छूटती-बिखरती रह गई
बेनहाई हुई, बग़ैर सँवारे बाल...
उसके चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं,
हरे, पीले, नीले, सफ़ेद साँप रेंगते हैं
उसके होंठों में शब्द नहीं
शब्द नहीं
मुड़े हुए घुटनों के ऊपर
अँधेरी झाड़ियों में
सिर्फ़ एक अक्षर
होता है बीज-मंत्र
स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं
स्त्रीं स्त्रीं
और
कुछ नहीं होता है अकाल... केवल यही... कि...
पूरा का पूरा यह शहर खारे पानी में डूब जाता है
उस एक बेनज़ीर औरत के मातम में,
हम एक नया मर्सिया क्यों नहीं लिखे?

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