"मिर्ज़ा ग़ालिब की 10 बेहतरीन ग़ज़लें: दिल को छू जाने वाले शेर"

मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को हुआ था, और वे उर्दू साहित्य के सबसे महान शायरों में से एक माने जाते हैं। उनका असली नाम ग़ुलाम मुहम्मद था, लेकिन हम उन्हें मिर्ज़ा ग़ालिब के नाम से ज्यादा जानते हैं। ग़ालिब के शेरों में एक गहरी दार्शनिकता, प्रेम, दर्द और जीवन की अस्थिरता की भावना देखने को मिलती है। उन्होंने 3000 से भी ज़्यादा शेर लिखे थे, और उनकी शायरी आज भी दिलों को छू जाती है।

मिरज़ा ग़ालिब का अंदाज और शैली बहुत खास थी, खासकर उनके ग़ज़ल लिखने का तरीका। कुछ उनके प्रसिद्ध शेरों में से एक है:

"हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले।"

ग़ालिब का योगदान सिर्फ उनकी शायरी तक सीमित नहीं था, उन्होंने उर्दू साहित्य में भी कई बदलाव किए। उनका जीवन बहुत मुश्किलों से भरा हुआ था, लेकिन इसके बावजूद उनका साहित्य आज भी जीवित है। क्या तुम ग़ालिब के किसी शेर को पसंद करते हो?

पेश है मिर्ज़ा ग़ालिब के कुछ प्रसिद्ध ग़ज़ल के शेर:

 

1.हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है

2.इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के

3.उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

4.मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

5.पूछते हैं वो कि 'ग़ालिब' कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएँ क्या

6.इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

7.रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

8.की मिरे क़त्ल के बाद उस ने जफ़ा से तौबा
हाए उस ज़ूद-पशीमाँ का पशीमाँ होना

9.हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक

10.हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

 

 

 

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.