लघु कथा : “31 दिसंबर की शाम”

31 दिसंबर की शाम थी। आसमान में हल्की ठंड घुली हुई थी और शहर की रौशनियाँ कुछ ज़्यादा ही चमक रही थीं। लोग जश्न की तैयारी में थे—कहीं पार्टी, कहीं पटाखे, कहीं ठहाके। लेकिन उसी भीड़ में आरव चुपचाप बालकनी में खड़ा था, हाथ में चाय का कप लिए।

यह साल उसके लिए आसान नहीं था। कुछ सपने अधूरे रह गए थे, कुछ अपने छूट गए थे, और कुछ गलतियाँ थीं जो हर रात उसे याद दिलाती थीं कि वह इंसान है—परफेक्ट नहीं।

घड़ी ने 11:59 दिखाया।आरव ने मोबाइल देखा—कोई खास मैसेज नहीं। उसने हल्की मुस्कान के साथ आँखें बंद कर लीं।12:00 बजते ही-आतिशबाज़ी की आवाज़ गूँज उठी। नया साल आ चुका था।उसी पल उसका फोन वाइब्रेट हुआ।
एक साधारण-सा मैसेज था:
"जो बीत गया, उसे जाने दो। जो आया है, उसे पूरी ईमानदारी से जीओ। Happy New Year."
आरव नहीं जानता था यह मैसेज किसका है,लेकिन उसे लगा जैसे यह नए साल का पहला वादा हो।
उसने चाय का आख़िरी घूँट लिया और मन ही मन कहा—“इस साल मैं खुद से भागूँगा नहीं। कोशिश करूँगा। गिरूँगा तो उठूँगा।”
ठंडी हवा अब सुकून देने लगी थी।31 दिसंबर की शाम, जो बोझिल थी,नए साल की सुबह से पहले उम्मीद बन चुकी थी। शायद नया साल ऐसे ही शुरू होता है—बिना शोर के,बस एक छोटे-से फैसले के साथ।

सीख:
जो बीत गया उसे पकड़कर रखने से आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है।नया साल या नया दिन बदलाव अपने आप नहीं लाता—बदलाव तब आता है, जब हम खुद से एक छोटा-सा सच्चा वादा करते हैं कि हम कोशिश करेंगे, हार मानकर रुकेंगे नहीं और खुद को फिर एक मौका देंगे।

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