सत्य का साहसी साधक: ख़लील जिब्रान की अमर विचारधारा
ख़लील जिब्रान का जन्म 6 जनवरी 1883 को लेबनान में हुआ था। केवल 46 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके विचार और लेखन आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उन्होंने हमेशा सत्य और मानवता की बात की, भले ही इसके कारण उन्हें धार्मिक और राजनीतिक अधिकारियों का विरोध सहना पड़ा। उनका जीवन और कृति हमें आज भी प्रेरित करती है।
सत्य के बारे में जिब्रान की सोच
ख़लील जिब्रान का मानना था कि सत्य एक अत्यंत निजी और पवित्र अनुभव है। जब हम इसे शब्दों में ढालते हैं, तो इसकी शुद्धता कम हो जाती है। शब्द सीमित हैं, जबकि सत्य असीम है। इसलिए जिब्रान कहते थे कि सत्य को हर समय नहीं बोलना चाहिए। वे अक्सर कहते थे: “सत्य बताने के लिए दो व्यक्तियों की आवश्यकता होती है: एक उसे बोलने के लिए और दूसरा उसे समझने के लिए।”
चर्च और पादरियों पर तीखा प्रहार
जिब्रान के विचार और लेखन उनके समय के धार्मिक और राजनीतिक अधिकारियों को पसंद नहीं आए। उन्होंने अपनी अरबी पुस्तक ‘विद्रोही आत्माएं’ में चर्च और पादरियों के भ्रष्टाचार की आलोचना की। उन्होंने उन पादरियों और अधिकारियों पर प्रहार किया जो गरीब किसानों का शोषण करते थे। धर्म के नाम पर पाखंड फैलाने वालों की उन्होंने तीव्र निंदा की। इस कारण, मैरोनाइट कैथोलिक चर्च ने उन्हें धर्म से बाहर कर दिया और अधिकारी उन्हें "खतरनाक, विद्रोही और युवाओं के लिए विषैला" घोषित कर चुके थे।
विवादास्पद कहानियां और राजनीतिक लेखन
जिब्रान का लेखन केवल धर्म तक सीमित नहीं था। उन्होंने राजनीतिक अन्याय और तानाशाही के खिलाफ भी आवाज उठाई।
उनकी पुस्तक ‘विद्रोही आत्माएं’ को बेरूत के सार्वजनिक बाजार में जला दिया गया।
कहानी ‘खलील द हेरेटिक’ में उन्होंने धार्मिक कट्टरता और सामाजिक अन्याय के खिलाफ खड़े पात्र का चित्रण किया, जिसे सत्ता और धर्म दोनों के लिए चुनौती माना गया। इस समय लेबनान ऑटोमन साम्राज्य के अधीन था, और उनके साहसिक लेखन के कारण उन्हें देश से निर्वासित होना पड़ा।
ज़िंदगी में उतारने योग्य ख़लील जिब्रान की 10 अमूल्य बातें
1.सत्य को जानें, लेकिन उसे कहें कभी-कभी।
2.दानशीलता का अर्थ: यह देना कि जिसकी जरूरत आपको मुझसे ज्यादा है।
3.सुख और दुःख का संबंध: कुछ सुखों की इच्छा ही मेरे दुःखों का हिस्सा है।
4.आध्यात्मिक भक्ति: यदि तुम्हारे हाथ रुपए से भरे हैं, तो वे परमात्मा की वंदना के लिए कैसे उठ सकते हैं।
5.क्षमा और आनंद: जो पुरुष स्त्रियों के छोटे अपराधों को क्षमा नहीं करते, वे उनके महान गुणों का आनंद नहीं ले सकते।
6.समानता: मंदिर के द्वार पर हम सभी भिखारी हैं।
7.हृदय की शुद्धि: अगर ईर्ष्या और घृणा का ज्वालामुखी धधक रहा है, तो फूलों की आशा कैसे कर सकते हो।
8.महापुरुष की पहचान: वह आदमी जो न दूसरों के अधीन है और न खुद किसी के अधीन।
9.अतिशयोक्ति: यह एक यथार्थता है जो अपने आप से बाहर हो गई है।
10.इच्छा और उदासीनता: इच्छा आधा जीवन है, और उदासीनता आधी मौत।

No Previous Comments found.