क्या बदल रहा लोधी समाज का सियासी रुझान? BJP-SP के लिए क्यों अहम है यह वोटबैंक

उत्तर प्रदेश की सियासत में एक ऐसा समाज, जिसकी आबादी भले ही बहुत बड़े जातीय समूहों जितनी न हो, लेकिन कई इलाकों में जिसका वोट चुनावी नतीजों का रुख बदलने की ताकत रखता है! बात हो रही है लोधी समाज की। वही लोधी समाज, जिसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में मजबूत पहचान दिलाने वाले बड़े नेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। कल्याण सिंह की राजनीति, भाजपा के साथ उनका लंबा रिश्ता और पिछड़े वर्गों के बीच उनकी पकड़ ने लोधी समाज को प्रदेश की सियासत में खास जगह दिलाई। लेकिन अब सवाल है-क्या लोधी समाज का वोट पहले की तरह किसी एक पार्टी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ है, या बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच इस समाज के वोटों में भी बदलाव दिखाई दे रहा है? भाजपा के लिए यह समाज लंबे समय से अहम माना जाता रहा है, तो समाजवादी पार्टी भी अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक अभियान के जरिए गैर-यादव पिछड़े वर्गों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। तो आखिर उत्तर प्रदेश में लोधी समाज की राजनीतिक ताकत कितनी है? किन जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में इसकी मौजूदगी चुनावी समीकरणों में अहम मानी जाती है? कल्याण सिंह की विरासत का आज की राजनीति में क्या महत्व है? भाजपा इस समाज के साथ अपने पुराने रिश्ते को कैसे देखती है, और समाजवादी पार्टी PDA के जरिए किस तरह अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है? आइए, आंकड़ों, चुनावी इतिहास और प्रमुख राजनीतिक चेहरों के जरिए समझते हैं लोधी समाज का पूरा सियासी गणित।

उत्तर प्रदेश में लोधी समाज को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी OBC के महत्वपूर्ण समुदायों में गिना जाता है। इस समाज की पहचान सिर्फ किसी एक जिले या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। ब्रज से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड, बुंदेलखंड और अवध के कई इलाकों में इसकी मौजूदगी का जिक्र राजनीतिक चर्चाओं में होता रहा है। लोधी, लोध, लोधा और लोधी राजपूत जैसे नाम अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इस्तेमाल किए जाते हैं। कुछ लोग वर्मा, सिंह, राजपूत या ठाकुर जैसे उपनाम भी लिखते हैं। 
अब बात आबादी की। उत्तर प्रदेश में लोधी समाज की वास्तविक आबादी को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आते रहे हैं। कई राजनीतिक और मीडिया आकलनों में इसे प्रदेश की कुल आबादी का करीब तीन से चार प्रतिशत बताया जाता है। सियासत में किसी समुदाय का प्रभाव केवल उसकी कुल आबादी से तय नहीं होता। यह भी मायने रखता है कि वह किन क्षेत्रों में केंद्रित है, स्थानीय स्तर पर उसके नेताओं की कितनी पकड़ है और चुनाव में दूसरे सामाजिक समूहों के साथ उसका कैसा समीकरण बनता है। यही वजह है कि लोधी समाज की चर्चा कई बार प्रदेश की उन सीटों के संदर्भ में होती है, जहां मुकाबला करीबी हो और विभिन्न समुदायों के वोट नतीजे पर असर डाल सकते हों।

लोधी समाज की राजनीतिक भूमिका को समझने के लिए उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय नक्शे पर नजर डालना जरूरी है। एटा, कासगंज, बदायूं, फर्रुखाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, इटावा, औरैया और कन्नौज जैसे जिलों में इस समुदाय की मौजूदगी का उल्लेख किया जाता रहा है। इसके अलावा उन्नाव, शाहजहांपुर, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जैसे जिलों में भी लोधी समाज को स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। रामपुर, बरेली, हरदोई और कानपुर के आसपास के कुछ इलाकों में भी इसकी मौजूदगी की चर्चा होती है। राजनीतिक आकलनों में अक्सर दावा किया जाता है कि प्रदेश की लगभग 35 से 40 विधानसभा सीटों पर लोधी समाज के मतदाता चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ सीटों पर इनकी संख्या हजारों में बताई जाती है, तो कुछ क्षेत्रों में इससे अधिक मौजूदगी का अनुमान लगाया जाता है। यहां एक बात समझना जरूरी है-किसी सीट पर किसी समुदाय की मौजूदगी ज्यादा होने का मतलब यह नहीं कि उसके सभी मतदाता एक ही पार्टी को वोट देंगे। चुनाव में उम्मीदवार की छवि, स्थानीय समस्याएं, पार्टी का संगठन, सरकार के कामकाज को लेकर लोगों की राय और दूसरे समुदायों के साथ बनने वाला गठजोड़ भी महत्वपूर्ण होता है। इसीलिए लोधी समाज का राजनीतिक महत्व केवल उसके वोटों की संख्या में नहीं, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों में उसके सामाजिक और चुनावी समीकरणों में भी देखा जाता है।

लोधी समाज की राजनीति का जिक्र हो और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का नाम न आए, ऐसा मुश्किल है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कल्याण सिंह को भाजपा के प्रमुख पिछड़े वर्ग के नेताओं में गिना जाता रहा है। 1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन और हिंदुत्व की राजनीति के दौर में उनकी भूमिका ने उन्हें प्रदेश की राजनीति का बड़ा चेहरा बनाया। कल्याण सिंह दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उनकी राजनीतिक पकड़ खास तौर पर एटा और आसपास के क्षेत्रों में चर्चा का विषय रही। उनके नेतृत्व ने लोधी समाज के एक बड़े हिस्से को राजनीतिक पहचान और प्रतिनिधित्व का अहसास दिलाया। इसी दौर में भाजपा और लोधी समाज के बीच मजबूत राजनीतिक संबंधों की चर्चा भी व्यापक हुई। हालांकि, इस रिश्ते को केवल जाति के आधार पर समझना अधूरा होगा। कल्याण सिंह की लोकप्रियता, उनकी राजनीतिक शैली, राम मंदिर आंदोलन, भाजपा की विचारधारा और स्थानीय सामाजिक समीकरण, इन सभी का अपना महत्व रहा। यही वजह है कि लंबे समय तक लोधी समाज के एक बड़े हिस्से को भाजपा का महत्वपूर्ण सामाजिक आधार माना जाता रहा। कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने वालों में उनके पुत्र राजवीर सिंह का नाम भी प्रमुख रहा, जो एटा लोकसभा सीट से भाजपा सांसद रह चुके हैं। उनके परिवार और उनसे जुड़े राजनीतिक नेटवर्क की वजह से भी लोधी समाज का भाजपा के साथ संबंध लगातार राजनीतिक चर्चा में बना रहा। लेकिन समय के साथ राजनीति बदलती है। नई पीढ़ी के मतदाताओं की प्राथमिकताएं, स्थानीय नेतृत्व, रोजगार और विकास जैसे मुद्दे और अलग-अलग दलों की सामाजिक गठबंधन रणनीतियां किसी भी समुदाय के मतदान व्यवहार को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए कल्याण सिंह की विरासत को महत्वपूर्ण मानते हुए भी यह मान लेना सही नहीं होगा कि आज हर लोधी मतदाता का राजनीतिक फैसला पहले से तय है।

अब बात करते हैं विधानसभा चुनाव के आंकड़ों की, क्योंकि यहीं से लोधी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की तस्वीर का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। राजनीतिक आकलनों के मुताबिक, 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में लोधी समाज से जुड़े 22 विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इनमें 18 विधायक भाजपा और 4 विधायक समाजवादी पार्टी से चुने गए बताए जाते हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, भाजपा के टिकट पर जीतने वाले लोधी समाज के विधायकों की संख्या ज्यादा थी, जबकि समाजवादी पार्टी भी इस समुदाय से प्रतिनिधित्व हासिल करने में कामयाब रही। लोधी समाज से जुड़े प्रमुख भाजपा नेताओं और विधायकों में अतरौली से संदीप सिंह, आंवला से धर्मपाल सिंह, बुलंदशहर की स्याना सीट से देवेंद्र सिंह लोधी और एटा जिले की मारहरा सीट से वीरेंद्र सिंह लोधी जैसे नाम शामिल रहे हैं। फिरोजाबाद की जसराना सीट से रामगोपाल उर्फ पप्पू लोधी का नाम भी इस संदर्भ में लिया जाता है। समाजवादी पार्टी की ओर से भी लोधी समाज के नेताओं ने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई है। राहुल लोधी और हमीरपुर से जुड़े अजेंद्र सिंह लोधी जैसे नाम इस समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चर्चा में सामने आते हैं।

मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का नाम भी लोधी समाज से जुड़े प्रमुख राजनीतिक चेहरों में लिया जाता है। वहीं केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा ने राष्ट्रीय राजनीति में इस समुदाय का प्रतिनिधित्व किया है। उत्तर प्रदेश में धर्मपाल सिंह और संदीप सिंह भी लोधी समाज से जुड़े प्रमुख नेताओं में गिने जाते हैं। उन्नाव से सांसद साक्षी महाराज का नाम भी इस संदर्भ में चर्चा में रहता है। हालांकि, इन नेताओं की राजनीतिक स्थिति, पद और चुनावी प्रदर्शन अलग-अलग समय पर बदलते रहे हैं। इसलिए किसी नेता की पुरानी उपलब्धि या पद को उसकी वर्तमान राजनीतिक स्थिति के बराबर नहीं माना जाना चाहिए। इन चेहरों की अहमियत सिर्फ इतनी नहीं कि वे एक ही समुदाय से आते हैं। वे अलग-अलग क्षेत्रों, राजनीतिक संगठनों और मतदाता समूहों के बीच काम करते रहे हैं। ऐसे में लोधी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को समझने के लिए इन नेताओं के प्रभाव के साथ-साथ उनके क्षेत्रीय आधार और चुनावी प्रदर्शन को भी देखना जरूरी है।

अब आते हैं उस सियासी मुकाबले पर, जिस पर 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नजरें टिकी हैं। एक तरफ भाजपा है, जिसके साथ लोधी समाज का लंबे समय से राजनीतिक रिश्ता माना जाता रहा है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी है, जो अपने PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक अभियान के जरिए अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ लाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए लोधी समाज की अहमियत उसकी क्षेत्रीय मौजूदगी और कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत से जुड़ी रही है। पार्टी के सामने इस सामाजिक आधार को बनाए रखने की चुनौती रहती है। इसके लिए स्थानीय नेताओं की भूमिका, संगठन की सक्रियता, सरकार के कामकाज और क्षेत्रीय मुद्दों पर जनता की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है। वहीं समाजवादी पार्टी की कोशिश है कि गैर-यादव पिछड़े वर्गों के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाई जाए। PDA की रणनीति के तहत पार्टी विभिन्न पिछड़े समुदायों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एक साझा राजनीतिक मंच पर लाने की बात करती है। इस रणनीति में लोधी समाज तक पहुंच बनाना भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। मतदाता यह भी देखते हैं कि उनके इलाके में सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सरकारी योजनाओं की स्थिति कैसी है। स्थानीय उम्मीदवार की पहुंच, जनता के बीच उसका व्यवहार और चुनाव के समय उठाए गए मुद्दे भी अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए 2027 से पहले भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच लोधी समाज को लेकर होने वाली राजनीतिक गतिविधियों को सिर्फ जातीय जोड़-तोड़ के तौर पर नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक गठबंधन की रणनीति के रूप में भी समझना होगा।

तो उत्तर प्रदेश की सियासत में लोधी समाज की कहानी सिर्फ एक वोटबैंक की कहानी नहीं है। यह कहानी है राजनीतिक पहचान की, कल्याण सिंह की विरासत की, भाजपा के साथ लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों की और उन नए समीकरणों की, जिन्हें समाजवादी पार्टी समेत दूसरे दल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। एक ओर भाजपा के लिए लोधी समाज का समर्थन अपने पुराने सामाजिक आधार को बनाए रखने से जुड़ा है, तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी PDA के जरिए गैर-यादव पिछड़े वर्गों तक अपनी पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और सपा, दोनों से लोधी समाज के विधायक चुने जाने और 2024 के लोकसभा चुनाव में अलग-अलग क्षेत्रों के नतीजों ने इस बात को रेखांकित किया कि समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व एक ही दल तक सीमित नहीं है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि 2027 में लोधी समाज का वोट किस दिशा में जाएगा। इसका जवाब केवल जातीय समीकरणों से नहीं मिलेगा। उम्मीदवार कौन होगा, स्थानीय मुद्दे क्या होंगे, राजनीतिक दल जनता के बीच कितना काम करते हैं और मतदाता किन बातों को प्राथमिकता देते हैं-ये सभी पहलू अहम होंगे। अब देखना होगा कि 2027 के चुनाव में लोधी समाज से जुड़े नेता और राजनीतिक दल किस तरह अपनी रणनीति बनाते हैं। क्या पुराने राजनीतिक रिश्ते पहले की तरह अहम बने रहेंगे, या नए सामाजिक गठबंधन और स्थानीय मुद्दे चुनावी तस्वीर में बदलाव लाएंगे? फिलहाल इतना साफ है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में लोधी समाज की भूमिका पर नजर बनी रहेगी और आने वाले चुनाव में इसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा मतदान व्यवहार को लेकर चर्चा और तेज हो सकती है।

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