LPG का विदेशी कनेक्शन और PNG का 'स्वदेशी जलवा'

दुनिया की सियासत में जब बारूद की गंध फैलती है, तो उसका सीधा असर आपकी रसोई के चूल्हे पर पड़ता है। मिडिल ईस्ट में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में कोहराम मचा दिया है। कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और भारत में LPG सिलेंडरों को लेकर हाहाकार मचा है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि जहां सिलेंडर के लिए लंबी कतारें और किल्लत दिख रही है, वहीं पाइप से आने वाली गैस यानी PNG (पाइप्ड नेचुरल गैस) के मोर्चे पर शांति है। आखिर ऐसा क्या जादू है PNG के पास कि वह युद्ध के थपेड़ों को झेल ले रही है, जबकि LPG पस्त हो रही है? आइए, रसोई के इस 'पॉवर गेम' को विस्तार से समझते हैं!

भारत में करोड़ों घरों की धड़कन LPG यानी लिक्विड पेट्रोलियम गैस पर टिकी है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी भारी निर्भरता है। हम अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे खाड़ी देशों से मंगवाते हैं। LPG के साथ दिक्कत सिर्फ इसके आयात की नहीं, बल्कि इसकी जटिल मेकिंग प्रोसेस की भी है।

जब खाड़ी देशों से कच्चा तेल भारत आता है, तो हमारी रिफाइनरियां (IOC, BPCL, HPCL) उसे साफ करती हैं। इस दौरान पेट्रोल-डीजल निकालते समय बायप्रोडक्ट के रूप में ब्यूटेन और प्रोपेन गैस निकलती है। इसे भारी-भरकम संयंत्रों में प्रेशराइज्ड करके 'लिक्विड' बनाया जाता है, जिसे हम LPG कहते हैं। दूसरा तरीका यह है कि सऊदी अरामको जैसी कंपनियां सीधे 'ऑटोगैस कार्गो' जहाजों से भारत भेजती हैं, जो कांडला या हल्दिया जैसे बंदरगाहों पर उतरता है।

अब सोचिए, पहले विदेश से जहाज चले, फिर बंदरगाह पर उतरे, फिर बॉटलिंग प्लांट पहुंचे, वहां सिलेंडरों में भरे गए और फिर ट्रकों के जरिए आपके घर तक आए। इस लंबी चेन में ट्रांसपोर्टेशन, लिक्विफिकेशन और मैनपावर का भारी खर्च जुड़ जाता है। आज जंग की वजह से जब खाड़ी देशों में प्रोसेसिंग प्लांट और सप्लाई रूट प्रभावित हुए हैं, तो यह पूरी चेन ताश के पत्तों की तरह ढह गई है। यही वजह है कि आज LPG की किल्लत ने आम आदमी का पसीना छुड़ा दिया है।

दूसरी तरफ बात करें PNG की, तो यह मीथेन गैस है और इसकी कहानी बिल्कुल अलग है। PNG की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसका एक बड़ा हिस्सा भारत की अपनी धरती और समुद्र की गहराइयों से निकलता है। रिलायंस और ONGC के KG बेसिन (आंध्र/ओडिशा तट) से लेकर राजस्थान और गुजरात के खंभात बेसिन तक, भारत के पास अपने प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। PNG के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि इसे किसी भारी-भरकम 'बॉटलिंग' या 'सिलेंडर' की जरूरत नहीं होती। यह कुएं से निकलती है और पाइपलाइन के जरिए सीधे डिस्ट्रिब्यूशन प्लांट और वहां से आपके किचन तक पहुंच जाती है। इसमें न तो बार-बार ट्रक चलाने का झंझट है और न ही लिक्विफिकेशन का भारी खर्च। इसी 'डायरेक्ट सप्लाई' की वजह से PNG, LPG के मुकाबले काफी सस्ती और टिकाऊ साबित हो रही है।

युद्ध के इस दौर में PNG के अडिग रहने के पीछे तीन बड़े कारण हैं:

मजबूत नेटवर्क: PNG का सप्लाई सिस्टम सिर्फ एक देश या एक रास्ते पर निर्भर नहीं है। भारत के पास अपना घरेलू उत्पादन तो है ही, साथ ही हम अलग-अलग देशों से भी गैस आयात करते हैं। यह सप्लाई चेन इतनी लचीली है कि अगर एक रास्ता बंद भी हो जाए, तो दूसरे इंपोर्ट टर्मिनल से पाइपलाइन में गैस डाली जा सकती है।

प्रोसेसिंग का झंझट नहीं: LPG के लिए गैस को लिक्विड में बदलना और फिर उसे सिलेंडर में भरना पड़ता है, जिसके लिए विशेष संयंत्र चाहिए। जंग में अगर ये प्लांट प्रभावित होते हैं, तो सप्लाई ठप हो जाती है। लेकिन PNG सीधे 'गैस फॉर्म' में चलती है। इसे बस पाइप में पंप करना होता है, जो कहीं ज्यादा आसान और सुरक्षित है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का डर नहीं: भले ही समुद्री रास्तों पर तनाव हो, लेकिन PNG के लिए हमारे पास कई वैकल्पिक स्रोत और लॉन्ग टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स हैं जो केवल खाड़ी देशों तक सीमित नहीं हैं। एक बार आपके घर तक पाइप पहुंच गया, तो समझ लीजिए कि आप गैस की 'होम डिलीवरी' के ऑटोमैटिक सिस्टम से जुड़ गए।

साफ है कि आत्मनिर्भरता ही सबसे बड़ा कवच है। LPG जहां विदेशी संकटों और लंबी सप्लाई चेन के बोझ तले दबी है, वहीं PNG अपनी सादगी और स्वदेशी उपलब्धता के कारण आज के दौर की 'सुपरहीरो' बनकर उभरी है। सरकार का PNG पर जोर देना सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की जरूरत है ताकि अगली बार जब दुनिया के किसी कोने में बम बरसें, तो कम से कम भारत की रसोई का चूल्हा शांत न रहे। अगर आप भी सिलेंडर की लाइनों से तंग आ चुके हैं, तो शायद अब समय पाइपलाइन वाली 'आजादी' चुनने का है!

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