“बचपन में मायोपिया नियंत्रण: चश्मे से पहले प्राकृतिक उपायों पर जोर”
लखनऊ : चश्मा फेको कुछ वामपंथी विचारधारा से प्रेरित लग सकता है परन्तु मैं राष्ट्रीय विचारधारा का व्यक्ति हूँ लेसिक भी युवा अवस्था में चश्में से छुटकारा पाने का उपाय है। मेरी 36 वर्ष की चिकित्सा संस्थानों की सेवा एवं 8 वर्ष की स्वतन्त्र प्रैक्टिस के उपरान्त अपनी स्टडी, रिसर्च के आधार पर मैंने पाया कि 3 वर्ष से 13 वर्ष के बच्चों की मायोपिया इक्सरसाईज, स्वस्थ्य खिलाई-पिलाई एवं प्राकृतिक चिकित्सा के माध्यम से मायोपिक दृष्टि बढ़ाई जा सकती है। शासकीय सेवा में मुझे 3 वर्ष के बच्चे का चश्मा विभागाध्यक्ष नेत्र द्वारा दिये गये नम्बर पर बनाना पड़ा तब मैंने निश्चय किया कि मैं स्टडी करूंगा मैंने पाया कि मानव के शरीर में प्लास्टिक सिटी / इलास्टिक सिटी होती है जब इक्सरसाईज द्वारा बच्चों को स्वस्थ्य और लम्बा तथा सुडौल बनाया जा सकता है, मायोपिया कोई बीमारी नहीं है सिर्फ आई बाल के अन्दर का साईज थोड़ा बड़ा होता है।
अपनी ए०आई० स्टडी में मैंने पढ़ा कि जापान में एक गांव है जहां 100 वर्ष के कम उम्र के लोगों का प्रवेश मना है तथा अनेकों स्कूल है जो 13 वर्ष के कम के बच्चों को चश्मा न लगाने के लिए प्रेरित करते हैं।
चश्में के व्यापार में मल्टीनेशनल कम्पनियों का प्रवेश हो चुका है कांच की जगह फाइबर के ग्लास लगाये जाने के लिए प्रेरित करते हैं जिसकी पारदर्शिता 96% है। कांच के ग्लास की लाईफ 100 वर्ष की होती है। कांच के 100 वर्ष के बर्तन पर थोड़ा रिन/ घड़ी साबुन लगाने से सोने की चमक की तरह नया हो जाता है।
बच्चा जब गर्भ में हो तभी माँ यदि चश्मा लगाती है तो उपचार शुरू हो जाना चाहिए। मेरा 03 वर्ष से 13 वर्ष तक के अभिभावकों से कहना है कि पहले अभ्यास, खान-पान, हरी घास पर टहलने का अभ्यास करवायें तथा किसी अनुभवी आई फिजीशियन से सम्पर्क करें। बच्चों को प्रारम्भ से ही चश्मा लगवाना, आप उसका वात्सल्य छीन रहे हैं बच्चों को चश्मे के बाद आउटडोर कार्यक्रमों से वंचित कर दिया जाता है केवल ए०सी० में बैठकर स्टडी और 99% मार्क्स के लिये प्रेरित करने के बजाय उसे पार्क / स्पोर्टस की आउट डोर की प्रैक्टिस करवायें तथा हरी घास में नंगे पैर टहलवाना भी उचित होगा।
यदि सफलता नहीं मिलती है तो चश्मा लगवाना उचित होगा। मैंने स्वयं चश्मा लगाना छोड़ दिया है।
रिपोर्टर : चौधरी मुकेश सिंह


No Previous Comments found.