श्री कृष्ण लीला मंचन के अंतिम दिन अत्याचारी कंस का वध कर श्रीकृष्ण ने नाना को सौंप दिया मथुरा का राज...

मोहनलालगंज/लखनऊ : नगर पंचायत मोहनलालगंज के मऊ बाजार में जय मां दुर्गे कृष्ण लीला समिति द्वारा आयोजित की जा रही कृष्ण लीला मंचन के अंतिम दिन श्रीकृष्ण लीला के निर्देशक राजेन्द्र गुप्ता के कुशल निर्देशन में कालिया नागनाथन के साथ ही श्री कृष्ण गोपियों की रासलीला के बाद कंस के बुलावे पर अक्रूर के साथ मथुरा पहुंचें श्रीकृष्ण और बलराम ने अत्याचारी कंस का वध कर राजा उग्रसेन और माता-पिता को मुक्त कराने के पश्चात अपने नाना उग्रसेन का राजतिलक कर मथुरा का राज सौंप दिया। कृष्ण लीला के अंतिम दिन का यह प्रसंग अधर्म पर धर्म की विजय का सबसे बड़ा प्रतीक है। लीला के आखिरी दिन पंडाल में मौजूद लोगों ने तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साह बढ़ाया। आज अंतिम दिन के धार्मिक प्रसंग में गोवर्धन लीला के बाद कंस को श्री कृष्ण की शक्तियों का पता चला तो उसने अक्रूर के जरिए कृष्ण और बलराम को मथुरा बुलाया। श्रीकृष्ण और बलराम जब कंस के धनुष यज्ञ और मल्ल-युद्ध (कुश्ती) के आमंत्रण पर रंगशाला (अखाड़े) में पहुँचे, तो कंस ने उन्हें मारने की पूरी योजना बना रखी थी। अखाड़े के द्वार पर कंस ने कुवलयापीड नाम के एक पागल और विशालकाय हाथी को छोड़ रखा था। श्रीकृष्ण ने खेल ही खेल में उस भयानक हाथी का वध कर दिया और उसके दाँत उखाड़ लिए। इसके बाद अखाड़े में पहुँचते ही कंस के सबसे शक्तिशाली पहलवानों चाणूर, मुष्टिक, तोशलक और कूट ने दोनों भाइयों को चुनौती दी। श्रीकृष्ण ने चाणूर को और बलराम जी ने मुष्टिक को मल्ल-युद्ध में पछाड़कर उनका वध कर दिया। जहां यह प्रसंग देखकर दर्शन जोर-जोर से तालियां बजाने लगे और श्री कृष्णा बलराम की जय जयकार करने लगे वहीं दूसरी ओर अपने मुख्य पहलवानों और हाथी को मरा हुआ देख कंस भय से काँपने लगा और सिंहासन से उठकर अपनी तलवार निकाल ली। उसने अपने सैनिकों को कृष्ण, बलराम, नंद बाबा और वसुदेव को मार डालने का आदेश दिया। इससे पहले कि कंस के सैनिक कुछ कर पाते, श्रीकृष्ण उछलकर सीधे कंस के ऊंचे मंच (सिंहासन) पर पहुँच गए और बिना एक क्षण गंवाए ही श्रीकृष्ण ने कंस के बाल पकड़े, उसका मुकुट नीचे गिरा दिया और उसे सिंहासन से नीचे पटक दिया।श्रीकृष्ण कंस की छाती पर चढ़ गए और एक ही प्रहार में अत्याचारी कंस का वध कर दिया। कंस को मारकर श्रीकृष्ण ने उसके शव को पूरे अखाड़े में घसीटा ताकि प्रजा को उसके मरने का विश्वास हो जाए। कंस के वध के तुरंत बाद, दोनों भाई सीधे कंस के कारागार (बंदीगृह) की ओर भागे और वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण और बलराम ने अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव की बेड़ियों को काट दिया और उनके चरणों में गिरकर आशीर्वाद लिया। माता-पिता अपने पुत्रों को देख भावविह्वल हो गए। श्रीकृष्ण ने नाना उग्रसेन को भी कारागार से ससम्मान मुक्त कराया। कारागार से मुक्त कराने के बाद, श्रीकृष्ण ने मथुरा की प्रजा और यादवों की उपस्थिति में नाना उग्रसेन का दोबारा राजतिलक किया। श्रीकृष्ण ने स्वयं घोषणा की कि यदुवंश के नियमानुसार उग्रसेन ही मथुरा के महाराज रहेंगे और सभी यादव उनकी छत्रछाया में सुरक्षित रहेंगे। इस प्रकार मथुरा में फिर से धर्म और न्याय का शासन स्थापित हुआ।

रिपोर्टर : धीरज  तिवारी 

 

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.