लखनऊ कैंट का पूरा चुनावी गणित! 2012 से 2022 तक किसने मारी बाजी?

लखनऊ की सियासत में एक ऐसी विधानसभा सीट, जहां कभी कांग्रेस का झंडा बुलंद हुआ, फिर बीजेपी ने ऐसा दांव चला कि लगातार जीत का सिलसिला बन गया! जी हां, हम बात कर रहे हैं लखनऊ कैंट यानी लखनऊ छावनी विधानसभा सीट की। यह वही सीट है, जहां 2012 में कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने बीजेपी को शिकस्त दी, लेकिन पांच साल बाद तस्वीर पूरी तरह बदल गई। रीता बहुगुणा जोशी ने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामा और 2017 में उसी सीट से बीजेपी के टिकट पर जीत हासिल कर ली। इसके बाद 2019 में लोकसभा चुनाव जीतने के कारण रीता बहुगुणा जोशी ने विधानसभा सीट छोड़ दी और उपचुनाव में बीजेपी के सुरेश चंद्र तिवारी ने जीत दर्ज की। फिर आया 2022 का विधानसभा चुनाव, जब बीजेपी ने ब्रजेश पाठक को मैदान में उतारा। ब्रजेश पाठक ने भी जीत हासिल की और आज वह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री हैं। लेकिन इस सीट की कहानी सिर्फ नेताओं के दल बदलने और जीत-हार तक सीमित नहीं है। यहां सवाल यह भी है कि आखिर लखनऊ कैंट में बीजेपी की पकड़ कैसे मजबूत होती गई? हर चुनाव में जीत का अंतर क्यों बढ़ा? क्या यह नेताओं के चेहरे का असर था, पार्टी की रणनीति थी या मतदाताओं का बदलता रुझान? और सबसे बड़ा सवाल, 2027 के विधानसभा चुनाव में क्या बीजेपी अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रख पाएगी, या कोई नया राजनीतिक समीकरण कैंट की तस्वीर बदल देगा? आइए, आंकड़ों के जरिए समझते हैं लखनऊ कैंट विधानसभा सीट की पूरी चुनावी कहानी...2012 से 2022 तक, जीत से लेकर वोटों के अंतर तक और सियासी समीकरणों से लेकर जनता के स्थानीय मुद्दों तक।

लखनऊ कैंट विधानसभा सीट को लखनऊ छावनी के नाम से भी जाना जाता है। विधानसभा क्षेत्र संख्या 175 वाली यह सीट लखनऊ जिले में आती है और सामान्य श्रेणी की सीट है। यह लखनऊ लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। कैंट की राजनीति को समझने के लिए यहां के चुनावी इतिहास पर नजर डालना जरूरी है। इस सीट पर कांग्रेस और बीजेपी, दोनों अपनी ताकत दिखा चुकी हैं। लेकिन 2017 के बाद से हुए विधानसभा चुनाव और उपचुनाव में बीजेपी ने अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी है। 

अब एक-एक करके समझते हैं कि पिछले चुनावों में किस पार्टी ने कितने वोट हासिल किए और जीत का अंतर कितना रहा।

साल 2012 का विधानसभा चुनाव लखनऊ कैंट में कांग्रेस के लिए बड़ी कामयाबी लेकर आया। कांग्रेस की रीता बहुगुणा जोशी ने बीजेपी के सुरेश चंद्र तिवारी को हराकर जीत दर्ज की। रीता बहुगुणा जोशी को 63 हजार 52 वोट मिले, जबकि बीजेपी के सुरेश चंद्र तिवारी को 41 हजार 299 वोट हासिल हुए। दोनों के बीच जीत का अंतर 21 हजार 753 वोट रहा। वहीं, बहुजन समाज पार्टी के नवीन चंद्र द्विवेदी को 28 हजार 851 वोट मिले और समाजवादी पार्टी के सुरेश चौहान को 22 हजार 544 वोट हासिल हुए। यानी 2012 में मुकाबला सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी के बीच नहीं था। बीएसपी और सपा को भी अच्छी संख्या में वोट मिले। लेकिन बाजी कांग्रेस के हाथ लगी और रीता बहुगुणा जोशी ने कैंट सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। उस वक्त कांग्रेस के लिए यह जीत इसलिए भी अहम थी, क्योंकि लखनऊ की इस महत्वपूर्ण सीट पर उसने बीजेपी को पीछे छोड़ दिया था। लेकिन राजनीति में तस्वीर हमेशा एक जैसी नहीं रहती। अगले पांच साल में इसी सीट का समीकरण पूरी तरह बदलने वाला था।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले लखनऊ कैंट की राजनीति में बड़ा बदलाव हुआ। रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गईं। इसके बाद बीजेपी ने उन्हें इसी सीट से अपना उम्मीदवार बनाया। अब मुकाबला दिलचस्प था। 2012 में कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाली रीता बहुगुणा जोशी 2017 में बीजेपी के टिकट पर मैदान में थीं। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने अपर्णा यादव को उम्मीदवार बनाया। नतीजे आए तो बीजेपी ने जीत दर्ज की। रीता बहुगुणा जोशी को 95 हजार 402 वोट मिले, जबकि सपा की अपर्णा यादव को 61 हजार 606 वोट हासिल हुए। जीत का अंतर रहा 33 हजार 796 वोट। यह नतीजा कई मायनों में अहम था। पांच साल पहले जिस रीता बहुगुणा जोशी ने कांग्रेस के टिकट पर बीजेपी को हराया था, अब उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की। इस चुनाव ने कैंट सीट पर बीजेपी की स्थिति मजबूत कर दी। लेकिन आगे एक और बदलाव होना था, क्योंकि 2019 में रीता बहुगुणा जोशी लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंच गईं और विधानसभा की सीट खाली हो गई।

2019 में रीता बहुगुणा जोशी के लोकसभा पहुंचने के बाद लखनऊ कैंट विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराया गया। अब बीजेपी के सामने चुनौती थी कि वह इस सीट को अपने पास बनाए रखे। बीजेपी ने सुरेश चंद्र तिवारी को मैदान में उतारा। समाजवादी पार्टी की ओर से मेजर आशीष चतुर्वेदी, कांग्रेस की तरफ से दिलप्रीत सिंह विर्क और बीएसपी की ओर से अरुण द्विवेदी चुनाव मैदान में थे। नतीजों में बीजेपी के सुरेश चंद्र तिवारी ने जीत हासिल की। उन्हें 56 हजार 684 वोट मिले। समाजवादी पार्टी के मेजर आशीष चतुर्वेदी को 21 हजार 256 वोट, कांग्रेस के दिलप्रीत सिंह विर्क को 19 हजार 445 वोट और बीएसपी के अरुण द्विवेदी को 10 हजार 709 वोट मिले। सुरेश चंद्र तिवारी ने 35 हजार 428 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की और बीजेपी ने कैंट सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। इस उपचुनाव में एक बात साफ नजर आई, रीता बहुगुणा जोशी के सीट छोड़ने के बावजूद बीजेपी अपनी बढ़त बनाए रखने में कामयाब रही। यानी पार्टी की चुनौती सिर्फ अपने पुराने उम्मीदवार की लोकप्रियता पर निर्भर रहने की नहीं थी, बल्कि सीट पर अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने की भी थी।

अब बात करते हैं 2022 के विधानसभा चुनाव की। इस बार बीजेपी ने लखनऊ कैंट से ब्रजेश पाठक को उम्मीदवार बनाया। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने सुरेंद्र सिंह गांधी, जिन्हें राजू गांधी के नाम से भी जाना जाता है, को मैदान में उतारा। चुनाव में बीजेपी के ब्रजेश पाठक को एक लाख 8 हजार 147 वोट मिले। वहीं, सपा के सुरेंद्र सिंह गांधी को 68 हजार 635 वोट हासिल हुए। बीएसपी के अनिल पांडेय को 10 हजार 426 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के दिलप्रीत सिंह विर्क को 6 हजार 510 वोट हासिल हुए। ब्रजेश पाठक ने सपा के उम्मीदवार को 39 हजार 512 वोटों के अंतर से हराया और कैंट सीट पर बीजेपी की जीत का सिलसिला जारी रहा। इस जीत के बाद ब्रजेश पाठक उत्तर प्रदेश की राजनीति में और अहम भूमिका में नजर आए। वह प्रदेश सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। इस तरह 2012 में कांग्रेस से शुरू हुई जीत की कहानी 2017 से बीजेपी के खाते में चली गई और 2019 के उपचुनाव से लेकर 2022 तक पार्टी इस सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखने में सफल रही।

किसी भी विधानसभा क्षेत्र में चुनाव सिर्फ पार्टी और उम्मीदवार के नाम पर नहीं लड़ा जाता। जनता के रोजमर्रा के मुद्दे भी अहम होते हैं। लखनऊ कैंट में भी सड़क, जलनिकासी, पेयजल, सफाई, ट्रैफिक, पार्किंग और सार्वजनिक परिवहन जैसे विषयों की क्षेत्रवार पड़ताल जरूरी है। लोगों के सामने सवाल यह है कि उनके इलाके की सड़कें कैसी हैं? बारिश के समय जलभराव की समस्या कहां-कहां सामने आती है? पीने के पानी और सफाई की व्यवस्था कितनी बेहतर है? जाम और पार्किंग की परेशानी से लोगों को कितनी राहत मिल रही है? और सरकारी सेवाओं से जुड़े काम कितनी आसानी से हो पा रहे हैं?

अब नजरें 2027 के विधानसभा चुनाव पर हैं। लखनऊ कैंट में बीजेपी के सामने अपनी लगातार चुनावी बढ़त को बनाए रखने की चुनौती होगी। वहीं, विपक्ष के सामने यह सवाल रहेगा कि वह इस सीट पर बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के लिए किस तरह की रणनीति बनाता है और जनता के किन मुद्दों को प्रमुखता से उठाता है। कांग्रेस के लिए यह सीट इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि 2012 में इसी सीट पर पार्टी ने जीत हासिल की थी। समाजवादी पार्टी भी 2017, 2019 के उपचुनाव और 2022 में दूसरे स्थान पर रही, लेकिन वह जीत तक नहीं पहुंच सकी। हालांकि, पिछले चुनावों के नतीजों के आधार पर 2027 का परिणाम तय मान लेना सही नहीं होगा। आगामी चुनाव में उम्मीदवार कौन होगा, पार्टियों की रणनीति क्या होगी, स्थानीय मुद्दे कितने प्रभावी होंगे और मतदाता किसे समर्थन देंगे, इन सभी बातों से मुकाबले की दिशा प्रभावित हो सकती है। फिलहाल लखनऊ कैंट के मौजूदा विधायक बीजेपी के ब्रजेश पाठक हैं। 2022 में उन्होंने इस सीट से जीत हासिल की थी और वह उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री भी हैं।

तो यह है लखनऊ कैंट विधानसभा सीट की चुनावी कहानी-2012 में कांग्रेस की जीत, 2017 में रीता बहुगुणा जोशी के बीजेपी में आने के बाद बदला समीकरण, 2019 के उपचुनाव में सुरेश चंद्र तिवारी की जीत और 2022 में ब्रजेश पाठक के साथ बीजेपी का कब्जा बरकरार। आंकड़े बताते हैं कि पिछले चुनावों में बीजेपी की जीत का अंतर बढ़ा है। लेकिन लोकतंत्र में पुराना रिकॉर्ड ही भविष्य की गारंटी नहीं होता। जनता के मुद्दे, उम्मीदवार का चेहरा, राजनीतिक माहौल और मतदाताओं का फैसला, हर चुनाव में नई कहानी लिख सकते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या 2027 में लखनऊ कैंट में बीजेपी अपनी जीत का सिलसिला जारी रख पाएगी? क्या कांग्रेस अपनी पुरानी जमीन वापस पाने की कोशिश करेगी? या समाजवादी पार्टी कोई नया सियासी समीकरण बनाकर मुकाबले को दिलचस्प बनाएगी? इन सवालों का जवाब आने वाला चुनाव देगा। लेकिन इतना तय है कि लखनऊ कैंट की सियासत पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि यहां की लड़ाई सिर्फ सीट की नहीं, बल्कि राजनीतिक पकड़ और जनता के भरोसे की भी है।

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