लखनऊ पूर्व का पूरा चुनावी गणित! 2012 से 2024 तक BJP की जीत की कहानी
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ...सत्ता का केंद्र, सियासत का बड़ा मैदान और हर चुनाव में नए समीकरणों की गवाह! इसी राजधानी में एक ऐसी विधानसभा सीट है, जहां पिछले कई चुनावों से भारतीय जनता पार्टी का कब्जा बना हुआ है। हम बात कर रहे हैं लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट की, जहां 2012 में कलराज मिश्र ने जीत दर्ज की, फिर 2014 के उपचुनाव में बीजेपी ने आशुतोष टंडन यानी गोपाल जी पर भरोसा जताया। गोपाल जी ने 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भी अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा। लेकिन नवंबर 2023 में उनके निधन के बाद इस सीट पर एक बार फिर चुनावी मुकाबला हुआ और 2024 के उपचुनाव में बीजेपी के ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने जीत दर्ज कर ली। यानी 2012 से लेकर 2024 तक, चुनाव बदले, उम्मीदवार बदले, मुकाबले में चेहरे बदले, लेकिन जीत का नतीजा हर बार बीजेपी के पक्ष में गया। मगर इस जीत के पीछे का पूरा गणित क्या रहा? किस चुनाव में बीजेपी की जीत का अंतर बढ़ा और किस चुनाव में कम हुआ? समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने कितनी चुनौती पेश की? और सबसे बड़ा सवाल, लखनऊ पूर्व की जनता के सामने आज सड़क, सीवर, पानी, ट्रैफिक, सफाई और दूसरी बुनियादी सुविधाओं से जुड़े कौन-कौन से सवाल हैं? आज के इस खास चुनावी विश्लेषण में हम आपको बताएंगे लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट का पूरा इतिहास। 2012 से लेकर 2024 तक हर चुनाव का हिसाब, किसे कितने वोट मिले, कौन कितने वोटों से जीता और कैसे इस सीट पर बीजेपी का सियासी सफर आगे बढ़ा। तो चलिए, आंकड़ों और चुनावी घटनाक्रम के जरिए समझते हैं लखनऊ पूर्व की सियासत की पूरी कहानी।
लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट राजधानी लखनऊ की महत्वपूर्ण सीटों में गिनी जाती है। यह सामान्य श्रेणी की विधानसभा सीट है और लखनऊ जिले के अंतर्गत आती है। राजधानी की सीट होने के कारण यहां चुनावी मुकाबले पर राजनीतिक दलों की खास नजर रहती है। इस सीट की चुनावी कहानी को समझने के लिए हमें 2012 से शुरुआत करनी होगी। उस समय बीजेपी ने वरिष्ठ नेता कलराज मिश्र को मैदान में उतारा था। मुकाबले में समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार भी थे। चुनाव के नतीजे आए तो बीजेपी ने जीत दर्ज की और लखनऊ पूर्व की राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत की। लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी। 2014 में कलराज मिश्र के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद यह विधानसभा सीट खाली हो गई। इसके बाद उपचुनाव हुआ और बीजेपी ने आशुतोष टंडन को उम्मीदवार बनाया। यहीं से लखनऊ पूर्व की राजनीति में गोपाल जी के नाम से पहचाने जाने वाले आशुतोष टंडन का चुनावी सफर शुरू हुआ, जो आगे 2017 और 2022 तक जारी रहा।
सबसे पहले बात करते हैं 2012 के विधानसभा चुनाव की। इस चुनाव में बीजेपी ने कलराज मिश्र को उम्मीदवार बनाया था। उनके सामने समाजवादी पार्टी की जूही सिंह, कांग्रेस के रमेश श्रीवास्तव और बहुजन समाज पार्टी के कैप्टन के.सी. त्रिपाठी मैदान में थे। नतीजे आए तो कलराज मिश्र को कुल 68 हजार 726 वोट मिले। समाजवादी पार्टी की जूही सिंह 47 हजार 908 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। कांग्रेस के रमेश श्रीवास्तव को 35 हजार 227 वोट मिले, जबकि बीएसपी के कैप्टन के.सी. त्रिपाठी को 28 हजार 40 वोट हासिल हुए। इस तरह कलराज मिश्र ने जूही सिंह को 20 हजार 818 वोटों से हराकर जीत दर्ज की। यह चुनाव बीजेपी के लिए अहम रहा, क्योंकि राजधानी की इस सीट पर पार्टी ने विपक्षी उम्मीदवारों को पीछे छोड़ते हुए अपनी जीत का परचम लहराया। लेकिन 2012 की यह जीत आगे आने वाले चुनावों की कहानी का सिर्फ पहला अध्याय थी। 2014 में कलराज मिश्र के लोकसभा जाने के बाद सीट खाली हुई और उपचुनाव ने लखनऊ पूर्व की राजनीति में नया मोड़ ला दिया।
2014 में कलराज मिश्र के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराया गया। बीजेपी ने इस बार आशुतोष टंडन यानी गोपाल जी को उम्मीदवार बनाया। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर जूही सिंह पर भरोसा जताया। उपचुनाव के नतीजों में बीजेपी के आशुतोष टंडन ने 71 हजार 640 वोट हासिल किए। वहीं समाजवादी पार्टी की जूही सिंह को 45 हजार 181 वोट मिले। इस तरह आशुतोष टंडन ने 26 हजार 459 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
इस नतीजे के साथ बीजेपी ने लखनऊ पूर्व सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा और आशुतोष टंडन पहली बार इस विधानसभा क्षेत्र के विधायक बने। अब पार्टी के सामने अगले विधानसभा चुनाव में इस जीत को कायम रखने की चुनौती थी।
2017 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ पूर्व की सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर आशुतोष टंडन को मैदान में उतारा। इस बार मुकाबले में कांग्रेस के अनुराग सिंह भदौरिया भी थे। चुनाव के नतीजे सामने आए तो आशुतोष टंडन को 1 लाख 35 हजार 167 वोट मिले। कांग्रेस के अनुराग सिंह भदौरिया को 55 हजार 937 वोट हासिल हुए। दोनों के बीच जीत का अंतर रहा 79 हजार 230 वोट। यानी 2014 के उपचुनाव के मुकाबले 2017 में आशुतोष टंडन ने काफी बड़े अंतर से जीत दर्ज की। बीजेपी ने सीट अपने पास रखी और गोपाल जी लगातार दूसरी बार विधायक बने, अगर उनके 2014 के उपचुनाव से शुरू हुए कार्यकाल को गिना जाए। यह चुनावी नतीजा दिखाता है कि 2017 में बीजेपी के उम्मीदवार को इस सीट पर बड़ी बढ़त मिली।
अब आते हैं 2022 के विधानसभा चुनाव पर। इस बार भी बीजेपी ने आशुतोष टंडन को टिकट दिया, जबकि समाजवादी पार्टी ने अनुराग सिंह भदौरिया को मैदान में उतारा। बहुजन समाज पार्टी की ओर से आशीष कुमार सिन्हा और कांग्रेस की ओर से मनोज तिवारी चुनाव लड़ रहे थे। नतीजों में बीजेपी के आशुतोष टंडन को 1 लाख 52 हजार 928 वोट मिले। समाजवादी पार्टी के अनुराग सिंह भदौरिया को 84 हजार 197 वोट हासिल हुए। बीएसपी के आशीष कुमार सिन्हा को 9 हजार 834 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के मनोज तिवारी को 4 हजार 485 वोट प्राप्त हुए। इस तरह आशुतोष टंडन ने अनुराग सिंह भदौरिया को 68 हजार 731 वोटों से हराया और लगातार तीसरे चुनाव में जीत दर्ज की-2014 के उपचुनाव, 2017 और 2022 में। हालांकि, आंकड़ों पर गौर करें तो 2017 में जीत का अंतर 79 हजार 230 वोट था, जबकि 2022 में यह घटकर 68 हजार 731 वोट रह गया। इसका मतलब यह है कि दोनों चुनावों के बीच जीत के अंतर में कमी आई, लेकिन बीजेपी ने सीट अपने पास रखी।
लखनऊ पूर्व की राजनीति में नवंबर 2023 में बड़ा बदलाव आया, जब बीजेपी विधायक आशुतोष टंडन का निधन हो गया। उनके निधन के बाद यह विधानसभा सीट खाली हो गई और उपचुनाव की स्थिति बनी। आशुतोष टंडन लगातार तीन चुनावों में इस सीट से जीत दर्ज कर चुके थे। ऐसे में उनके निधन के बाद होने वाला उपचुनाव बीजेपी के लिए सीट बरकरार रखने का सवाल था, जबकि विपक्ष के सामने इस मौके पर मुकाबले को नया रूप देने की चुनौती थी। इसके बाद 2024 में लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराया गया। बीजेपी ने ओम प्रकाश श्रीवास्तव को उम्मीदवार बनाया, जबकि कांग्रेस की तरफ से मुकेश चौहान मैदान में उतरे। 2024 के उपचुनाव में बीजेपी के ओम प्रकाश श्रीवास्तव को 1 लाख 42 हजार 948 वोट मिले। कांग्रेस के मुकेश चौहान को 89 हजार 61 वोट हासिल हुए। इस तरह ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने 53 हजार 887 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। इस नतीजे के साथ बीजेपी ने लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। 2012 में कलराज मिश्र से शुरू हुआ बीजेपी की जीत का सिलसिला, 2014 के उपचुनाव में आशुतोष टंडन की जीत, 2017 और 2022 के नतीजों से होते हुए 2024 में ओम प्रकाश श्रीवास्तव की जीत तक पहुंचा।
अगर 2012 से 2024 तक के चुनावी आंकड़ों को एक साथ देखें तो लखनऊ पूर्व में हर बार बीजेपी के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की। 2012 में कलराज मिश्र 20 हजार 818 वोटों से जीते। 2014 के उपचुनाव में आशुतोष टंडन ने 26 हजार 459 वोटों के अंतर से जीत हासिल की। 2017 में उनकी जीत का अंतर बढ़कर 79 हजार 230 वोट हो गया। 2022 में भी वह जीते, हालांकि जीत का अंतर घटकर 68 हजार 731 वोट रह गया। इसके बाद 2024 के उपचुनाव में ओम प्रकाश श्रीवास्तव ने 53 हजार 887 वोटों से जीत दर्ज की। इन आंकड़ों से साफ है कि इन पांच चुनावों में बीजेपी ने सीट नहीं गंवाई। लेकिन हर चुनाव का राजनीतिक माहौल, उम्मीदवार और विपक्षी मुकाबला अलग रहा। इसलिए केवल जीत के अंतर को देखकर पूरे क्षेत्र की राजनीतिक सोच या भविष्य के चुनाव का नतीजा तय नहीं किया जा सकता।
चुनावी इतिहास अपनी जगह है, लेकिन किसी भी विधानसभा क्षेत्र की असली तस्वीर समझने के लिए यह देखना भी जरूरी है कि वहां रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की समस्याएं क्या हैं। लखनऊ पूर्व जैसे शहरी क्षेत्र में सड़क की हालत, सीवर और जलनिकासी, पेयजल की उपलब्धता, सफाई, कचरा प्रबंधन, ट्रैफिक और पार्किंग जैसे मुद्दों की पड़ताल की जा सकती है। इसके अलावा सार्वजनिक परिवहन, स्थानीय व्यापार, रोजगार और सरकारी सेवाओं तक लोगों की पहुंच भी अहम सवाल हैं। क्या लोगों को रोजमर्रा की आवाजाही में परेशानी होती है? क्या जलभराव या सीवर की समस्या किसी इलाके में बनी हुई है? पेयजल और सफाई की व्यवस्था को लेकर स्थानीय लोग क्या कहते हैं? कारोबारियों, दुकानदारों, युवाओं और महिलाओं की प्रमुख मांगें क्या हैं? और इन मुद्दों पर जनप्रतिनिधि तथा संबंधित विभागों की ओर से क्या काम हुआ है? इन सवालों का जवाब केवल चुनावी आंकड़ों से नहीं मिलेगा।
तो यह थी लखनऊ पूर्व विधानसभा सीट की पूरी चुनावी कहानी-2012 में कलराज मिश्र की जीत से लेकर 2014 के उपचुनाव में आशुतोष टंडन की एंट्री, 2017 और 2022 में गोपाल जी की जीत और फिर 2024 के उपचुनाव में ओम प्रकाश श्रीवास्तव के विधायक बनने तक। पांच चुनाव, अलग-अलग उम्मीदवार, बदले हुए मुकाबले, लेकिन नतीजा हर बार बीजेपी के पक्ष में रहा। इन चुनावों के आंकड़े लखनऊ पूर्व में बीजेपी की लगातार जीत का रिकॉर्ड जरूर दिखाते हैं, लेकिन क्षेत्र की पूरी राजनीतिक तस्वीर समझने के लिए जनता के मुद्दों, स्थानीय कामकाज और मतदाताओं की प्राथमिकताओं को भी जानना जरूरी है। आखिर सड़क, पानी, सीवर, सफाई, ट्रैफिक और रोजगार जैसे मुद्दों पर जनता क्या कहती है? जनप्रतिनिधियों के कामकाज को लेकर लोगों का अनुभव क्या है? और आने वाले चुनावों में किन सवालों पर चर्चा हो सकती है? इन बातों को समझने के लिए क्षेत्र की जमीनी पड़ताल सबसे अहम होगी।

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