घुटती सांसें, टूटते सपने और एक ख़ामोश चीख: पटियाला के ससुराल में लुधियाना की 'रानी' ने गंवाई जान

लुधियाना/पटियाला :  14 साल पहले जब लुधियाना की बेटी 'रानी' ने सुख-दुख के सात फेरे लेकर पटियाला के एक परिवार में कदम रखा था, तो उसकी आँखों में एक मुकम्मल जहान के सपने थे। उसने सोचा था कि पीहर छूटा तो क्या, ससुराल में उसे एक ऐसा आशियाना मिलेगा जहाँ प्यार की छांव और अपनों का दुलार होगा। लेकिन लुधियाना से पटियाला तक का यह सफर उसकी खुशियों की कब्रगाह बन जाएगा, इसका अंदाज़ा मासूम रानी को कभी नहीं था। जिस चौखट को वह अपना समझकर पूजती रही, वही चौखट एक दिन उसकी खुशियों, उसके अरमानों और अंततः उसकी ज़िंदगी की बली ले लेगी।

यह कहानी सिर्फ एक महिला की मौत की नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस भरोसे की हत्या की, जो रानी ने अपनों पर किया था।
पटियाला के ससुराल में हर रोज़ लहूलुहान होती रही आत्मा
रिश्तों को सहेजने की चाह में रानी हर दिन तिल-तिल कर मरती रही। पटियाला की उस चारदीवारी के भीतर छोटी-छोटी बातों पर मिलने वाले ताने, तिरस्कार और मानसिक प्रताड़ना उसके वजूद को ज़ख्मी करते रहे। लेकिन वह भारतीय नारी की उस सदियों पुरानी परंपरा को निभाती रही, जहाँ सिखाया जाता है कि  डोली उठती है तो ससुराल से अर्थी ही निकलनी चाहिए। वह इस झूठी उम्मीद के सहारे जीती रही कि शायद कल सब ठीक हो जाएगा, शायद कभी तो ससुराल वालों के दिलों में ममता जागेग।  ।जिसके कंधे पर सिर रखकर रोना था, उसी ने दिए सबसे गहरे ज़ख्म।
एक औरत दुनिया से लड़ सकती है, अगर उसका पति उसके साथ खड़ा हो। लेकिन यहाँ तो रानी का सबसे बड़ा हमसफ़र ही उसका सबसे बड़ा दर्द बन गया। वह हमसफ़र, जिसके साथ उसने सात फेरे लिए थे, वह उसे बार-बार बेघर करने की धमकियाँ देता रहा, उसकी भावनाओं को पैरों तले कुचलता रहा। रानी हर बार पति के आगे हाथ जोड़ती, गिड़गिड़ाती कि— *"ऐसा मत कीजिए, हमारा हंसता-खेलता आशियाना बिखर जाएगा, हमारे मासूम बच्चों का भविष्य अनाथ हो जाएगा।  मगर अफ़सोस, पत्थर के उन दिलों तक एक मजबूर मां और बेबस पत्नी की करुण पुकार कभी नहीं पहुँची।
 बच्चों की खातिर ओढ़ रखा था 'झूठी मुस्कान' का कफ़न
अपने कलेजे के टुकड़ों (बच्चों) की खातिर रानी ने बरसों तक ज़हर का घूंट पिया। आँखों में समंदर जितना आंसू छिपाकर, वह होठों पर झूठी मुस्कान सजाए घूमती रही ताकि बच्चों को आंच न आए। लेकिन अंदर ही अंदर सुलगती मानसिक प्रताड़ना ने उसके मन को इस कदर खोखला कर दिया कि वह गहरे अवсад (डिप्रेशन) के उस अंधेरे कुएं में गिरती चली गई, जहाँ से बाहर आने का उसे कोई रास्ता नहीं सूझा।
 आख़िरी वीडियो: "आप लोग मेरा घर बसने नहीं दे रहे
 मौत को गले लगाने से ठीक पहले, रानी ने रोते हुए एक वीडियो बनाया। उस वीडियो में बहते हुए आंसू, कांपती आवाज़ और चेहरे पर बिखरा बेबसी का वो दर्द किसी भी पत्थर दिल इंसान को रुला देने के लिए काफी है। वह रोती रही और बस एक ही बात दोहराती रही आप लोग मेरा घर बसने नहीं दे रहे। मैं हमेशा अपना परिवार बचाना चाहती थी, लेकिन मुझे बार-बार तोड़ा गया.
इन आख़िरी शब्दों में एक ऐसी अभागी मां का दर्द था, जिसने आख़िरी सांस तक बिखरते हुए घर को समेटने की कोशिश की, लेकिन अंत में अपनों की बेरुखी से हार गई।
सुलगते सवाल: क्या सिर्फ घर बचाना ही रानी का गुनाह था?
आज लुधियाना की वह बेटी, पटियाला की वह बहू हमेशा के लिए खामोश हो चुकी है। लेकिन पीछे छोड़ गई है कुछ ऐसे सवाल, जो हमारे समाज के मुंह पर करारा तमाचा हैं:
 क्या रानी का कसूर सिर्फ इतना था कि वह बिखरते हुए परिवार को जोड़कर रखना चाहती थी?
 रोज़-रोज़ घुटने वाली उस मानसिक प्रताड़ना के ज़िम्मेदार लोगों को समाज कब तक माफ़ करता रहेगा?
 अगर वक़्त रहते किसी एक शख्स ने भी रानी के आंसू पोंछ दिए होते, उसे गले से लगा लिया होता, तो क्या आज दो मासूम बच्चे अपनी मां के आंचल से महरूम होते?
अक्सर हम शरीर के ज़ख्मों को ही हिंसा मानते हैं, लेकिन मन पर दिए गए ज़ख्म कहीं ज़्यादा गहरे और जानलेवा होते हैं। यह घटना एक चेतावनी है। अपने आसपास की बेटियों, बहनों और बहुओं की खामोशी को पढ़ना सीखिए। घरेलू हिंसा को 'घर का आपसी मामला' कहकर पल्ला मत झाड़िए। याद रखिए, अगर आज हम रानी जैसी मासूमों की चीखें सुनकर भी बहरे बने रहे, तो कल किसी और बेटी की ज़िंदगी का दीया ऐसे ही असमय बुझ जाएगा।

रिपोर्टर : विकास निर्वाण 

 
 

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