माघ पूर्णिमा: आस्था, स्नान और दान का महापर्व

माघ मास की पूर्णिमा तिथि हिन्दू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व रखती है। यह दिन माघ महीने का समापन भी माना जाता है और इसी कारण इसे अत्यंत पुण्यदायी कहा गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन किया गया स्नान, दान और जप व्यक्ति को पापों से मुक्त कर आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।

माघ पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

पुराणों और धर्मग्रंथों में माघ मास को अत्यंत पवित्र बताया गया है। मान्यता है कि माघ महीने में सूर्य उत्तरायण रहते हैं और इस काल में जल, दान और तपस्या का विशेष फल प्राप्त होता है। माघ पूर्णिमा इस पूरे मास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिन गंगा, यमुना, सरस्वती या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से मनुष्य के समस्त कष्ट और दोष समाप्त होते हैं। विशेष रूप से प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में किया गया स्नान अत्यंत फलदायी माना गया है।

माघ स्नान और माघ मेला

माघ पूर्णिमा, प्रयागराज में आयोजित होने वाले माघ मेले का प्रमुख स्नान पर्व भी है। यह मेला पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर महाशिवरात्रि तक चलता है। इस दौरान लाखों श्रद्धालु कल्पवास करते हैं और संयमित जीवन अपनाकर धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि माघ मास में नियमित स्नान और दान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। पद्म पुराण में माघ स्नान को सभी तीर्थों के स्नान के बराबर फलदायी बताया गया है।

दान-पुण्य और व्रत का महत्व

माघ पूर्णिमा के दिन अन्न, वस्त्र, तिल, घी और कम्बल का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, सत्यनारायण कथा और व्रत करने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक विश्वास है कि इस दिन किया गया दान कई गुना पुण्य प्रदान करता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है।

सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व

माघ पूर्णिमा केवल धार्मिक पर्व ही नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं का भी प्रतीक है। माघ मेले में साधु-संतों का संगम, प्रवचन, भजन-कीर्तन और सेवा कार्य समाज में नैतिक मूल्यों को मजबूत करते हैं। यह पर्व भारतीय संस्कृति में त्याग, संयम और परोपकार की भावना को जीवंत करता है।


माघ पूर्णिमा भारतीय सनातन परंपरा में आस्था, तप और सेवा का अद्भुत संगम है। यह पर्व हमें आत्मशुद्धि, दान और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। आज भी करोड़ों श्रद्धालु इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर आध्यात्मिक शांति और पुण्य की कामना करते हैं, जिससे यह पर्व युगों-युगों से जीवंत बना हुआ है।

Leave a Reply



comments

Loading.....
  • No Previous Comments found.