महिला आरक्षण बिल पर अखिलेश का नया दांव! 3 शर्तों से बढ़ी हलचल

कहते हैं सियासत में न तो कोई परमानेंट दोस्त होता है और न ही परमानेंट दुश्मन, बस होती है तो सिर्फ मौके की नजाकत! जी हां याद करिए 16 अप्रैल 2026 का वो दिन, जब दिल्ली के संसद भवन का पारा सातवें आसमान पर था। महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर बहस छिड़ी थी। वार-पलटवार के बीच अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खड़े होते हैं और सपा प्रमुख की तरफ देखकर चुटकी लेते हुए मुस्कुराकर कहते हैं....."अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, जो कभी-कभी हमारी मदद कर देते हैं।" उस वक्त संसद में ठहाके तो गूंजे, अखिलेश यादव मुस्कुराए और उनकी पत्नी डिंपल यादव भी हंस पड़ीं, लेकिन राजनीति के पन्नों पर अखिलेश ने उस वक्त मोदी सरकार की मदद नहीं की। सपा विपक्ष के साथ चट्टान की तरह खड़ी रही, बिल के खिलाफ वोटिंग की और सरकार वो बिल पास कराने में नाकाम रही। लेकिन महज़ तीन महीने के भीतर गंगा और यमुना में बहुत सारा पानी बह चुका है! जो अखिलेश यादव अप्रैल में इस बिल के घोर विरोधी थे, अब जुलाई आते-आते उन्होंने ऐसा यू-टर्न मारा है जिसने पूरी भारतीय राजनीति में खलबली मचा दी है। मॉनसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले अखिलेश यादव ने मोदी सरकार को शर्तों वाला समर्थन देने के पॉजिटिव संकेत दे दिए हैं। अब ये यू-टर्न है, सरेंडर है या फिर 2027 के यूपी चुनाव से पहले अखिलेश का मास्टरस्ट्रोक? आइए इस पूरी इनसाइड स्टोरी को विस्तार से समझते हैं!

आपको बता दें अखिलेश यादव राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। अप्रैल से जुलाई के बीच देश की सियासत का पूरा भूगोल और अंकगणित बदल गया है। दरअसल, विपक्ष का कुनबा ताश के पत्तों की तरह बिखर चुका है, जिसने सपा प्रमुख को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया। पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद बगावत करके अलग हो गए और उन्होंने NCPI में विलय करके मोदी सरकार को समर्थन दे दिया। वहीं महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी के 9 में से 6 लोकसभा सांसद टूटकर एक बार फिर शिंदे खेमे के साथ जा मिले। दक्षिण भारत में विपक्ष का मजबूत किला माने जाने वाले स्टालिन की DMK भी इंडिया ब्लॉक से किनारा कर चुकी है। जहां नतीजा ये रहा कि जो बीजेपी अप्रैल में बहुमत के आंकड़ों के लिए जूझ रही थी, वो अब सहयोगियों और टूट-फूट के दम पर संसद में दो-तिहाई बहुमत के जादुई आंकड़े के बेहद करीब खड़ी है। अखिलेश यादव बखूबी समझ गए कि अब वो विरोध करें या न करें, मोदी सरकार अपने दम पर यह बिल पास करा लेगी। ऐसे में अकेले विरोध करके महिला विरोधी का टैग लगवाने और विलेन बनने से बेहतर था कि खेल में शामिल होकर अपनी शर्तें थोप दी जाएं! आपको बता दें बीते मंगलवार को जब महिला संगठनों और सिविल सोसाइटी के एक बड़े प्रतिनिधिमंडल ने लखनऊ में अखिलेश यादव से मुलाकात की, तो अखिलेश ने सोशल मीडिया पर अपनी नई चाल चल दी। उन्होंने साफ कर दिया कि वो महिला आरक्षण और परिसीमन बिल का समर्थन करने को तैयार हैं, लेकिन सरकार को उनकी तीन बड़ी शर्तें माननी होंगी। 

पहली...महिला आरक्षण 2027 के यूपी चुनाव से ही लागू हो

दरअसल, अभी के नियम के मुताबिक, महिला आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद लागू होना है, जिसमें लंबा वक्त लग सकता है। लेकिन अखिलेश ने टाइमिंग का खेल खेलते हुए मांग की है कि इसे तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए और इसकी शुरुआत 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ही कर दी जाए।

दूसरी...उच्च सदन में भी मिले आरक्षण

अखिलेश यादव का कहना है कि महिलाओं को हक सिर्फ लोकसभा या विधानसभा तक सीमित न रहे। परिसीमन बिल के जरिए राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों में सीटों की संख्या बढ़ाई जाए और वहां भी महिलाओं को आरक्षण दिया जाए।

तीसरी...PDA महिलाओं को कोटा के भीतर कोटा
दरअसल, यह अखिलेश का सबसे बड़ा सियासी कार्ड है। उन्होंने मांग की है कि महिला आरक्षण बिल के भीतर PDA यानी पिछड़े समाज, दलित और अल्पसंख्यक मुस्लिम महिलाओं के लिए उचित प्रतिनिधित्व और अलग से कोटा सुनिश्चित किया जाए।

ऐसे में अखिलेश यादव के इस कदम को राजनीतिक गलियारों में यू-टर्न से ज्यादा राजनीतिक आत्मरक्षा माना जा रहा है। इसके पीछे दो बेहद ठोस वजहें हैं। 

पहली...महिला विरोधी' छवि से बचना

अप्रैल में जब सपा ने इस बिल का विरोध किया था, तब बीजेपी ने यूपी के कोने-कोने में ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया था कि अखिलेश यादव महिलाओं को उनका हक नहीं देना चाहते। 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए अखिलेश आधी आबादी की नाराजगी मोल लेने का रिस्क बिल्कुल नहीं उठा सकते थे।

दूसरी...ममता-स्टालिन के हश्र से सबक

बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में स्टालिन का जो सियासी नुकसान हुआ है, उसे अखिलेश अपनी आंखों से देख चुके हैं। जब देश की आधी आबादी यानि महिलाएं साइलेंट वोटर बनकर चुनाव की दिशा तय कर रही हैं, तो उनके एजेंडे के खिलाफ जाना आत्मघाती हो सकता था।

इसलिए अखिलेश ने बेहद चालाकी से भाजपा के बुने जाल को उन्हीं की तरफ मोड़ दिया है। अब गेंद मोदी सरकार के पाले में है। अगर सरकार इन शर्तों को मानती है, तो अखिलेश इसका क्रेडिट लेंगे कि उन्होंने पिछड़ों-मुस्लिमों को हक दिलाया। अगर सरकार नहीं मानती, तो अखिलेश कहेंगे कि बीजेपी पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को हक देना ही नहीं चाहती! आपको बता दें इस पूरी सियासी कहानी की नींव उस दिन पड़ी थी जब संसद में पीएम मोदी का भाषण चल रहा था। पीएम मोदी जब मंच से बोल रहे थे, तभी सपा सांसद धर्मेंद्र यादव अपनी सीट पर खड़े हो गए और सीधे पीएम पर निशाना साधते हुए बोले कि "आप भी पिछड़ी जाति से हैं, लेकिन पिछड़ों का ध्यान नहीं रखते। ये पूरा देश देख रहा है।" वहीं इस सीधे हमले पर पीएम मोदी विचलित नहीं हुए, बल्कि उन्होंने अपने चिर-परिचित मजाकिया और तंजिया अंदाज में मोर्चा संभाला। पीएम मोदी मुस्कुराए और बोले कि "धर्मेंद्र जी, मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने मेरी पहचान करा दी। ये बात बिल्कुल सही है कि मैं अति पिछड़े समाज से आता हूं...और अखिलेश जी मेरे मित्र हैं, तो वो कभी-कभी मेरी मदद कर देते हैं।" 

वो माहौल भले ही खुशनुमा था, लेकिन उसके पीछे छिपी सियासी शह-मात का खेल आज जुलाई के मॉनसून सत्र में खुलकर सामने आ गया है। तो कुल मिलाकर कहानी ये है कि मॉनसून सत्र से ठीक पहले दिल्ली और लखनऊ का सियासी पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। विपक्ष के बिखराव ने जहां एनडीए को दो-तिहाई बहुमत की दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया है, वहीं अखिलेश यादव ने शर्तों के साथ समर्थन का ऐसा पासा फेंका है जिसने बीजेपी को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने मित्र अखिलेश की इन तीन शर्तों को मानकर महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर सर्वसम्मति का इतिहास रचते हैं, या फिर इस मॉनसून सत्र में देश को कोई और नया राजनीतिक भूचाल देखने को मिलता है। फिलहाल जो भी हो, उत्तर प्रदेश के 2027 के दंगल से पहले खेला शुरू हो चुका है, और इस बार की बाजी बेहद दिलचस्प होने वाली है! 

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