7 जजों को 9 घंटे तक बनाया बंधक, SC ने संभाली कमान

जरा सोचिए, क्या किसी राज्य में न्याय के रक्षकों को ही बंधक बना लिया जाए? क्या खाकी और प्रशासन तमाशबीन बना रहे जब कानून के अफसरों की जान पर बन आए? जी हां मालदा में बुधवार को जो हुआ, उसने पूरे देश को शर्मसार कर दिया है। 7 न्यायिक अधिकारी, जिनमें 3 महिलाएं थीं, उन्हें 9 घंटे तक उग्र भीड़ ने बंधक बनाए रखा। और सबसे चौंकाने वाली बात जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को आधी रात को आदेश देना पड़ा, तब जाकर बंगाल का प्रशासन नींद से जागा! यह महज एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, यह न्यायपालिका की गरिमा पर सीधा और सुनियोजित प्रहार था। देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट....

आपको बता दें पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बीच मालदा जिला जंग का मैदान बन गया। घटना कलियाचक-2 बीडीओ ऑफिस की है, जहाँ SIR के तहत वोटर लिस्ट के दस्तावेजों का सत्यापन चल रहा था। जैसे ही खबर फैली कि बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटे गए हैं, तो सैकड़ों की उग्र भीड़ ने दफ्तर को घेर लिया। अंदर मौजूद 7 न्यायिक अधिकारियों को, जिनमें महिला अफसर भी शामिल थीं, उन्हें बंधक बना लिया गया। दफ्तर के शीशे तोड़े गए, फर्नीचर को बांस से पीटा गया और नेशनल हाईवे-12 पर टायर जलाकर तांडव मचाया गया। अधिकारियों को न खाना मिला, न पानी, वो 9 घंटे तक मौत के साए में रहे। मामला इतना गंभीर था कि सुप्रीम कोर्ट को रातों रात ही सुनवाई करनी पड़ी। 
चीफ जस्टिस सूर्य कांत इस घटना से इतने आगबबूला हुए कि उन्होंने इसे 'न्यायपालिका पर बेशर्म हमला' करार दिया। CJI ने खुलासा किया कि दोपहर 3:30 बजे घेराव शुरू हुआ, लेकिन रात 8:30 बजे तक प्रशासन ने उंगली तक नहीं हिलायी। CJI ने ममता सरकार को फटकार लगाई कि "बंधक बनाई गई एक महिला अधिकारी का 5 साल का बच्चा है, लेकिन रात 11 बजे तक कलेक्टर वहां नहीं पहुंचे। कोर्ट ने कहा कि बंगाल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है और यह अधिकारियों द्वारा अपनी ड्यूटी से मुंह मोड़ना है। 

जस्टिस सूर्य कांत की पीठ ने साफ कहा कि यह कोई सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं था। यह न्यायिक अधिकारियों का मनोबल तोड़ने और वोटर लिस्ट सत्यापन की प्रक्रिया को रोकने की एक 'सुनियोजित साजिश' थी। कोर्ट ने चेतावनी दी कि वह किसी को भी कानून हाथ में लेकर जजों पर मानसिक हमला करने की इजाजत नहीं देगा। जिसके बाद कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव, गृह सचिव और डीजीपी को 'कारण बताओ' नोटिस जारी किया है। उनसे पूछा गया है कि उनकी लापरवाही के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए? साथ ही, कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इस हिंसा की जांच CBI या NIA को सौंपी जाए। सुप्रीम कोर्ट अब खुद इस मामले की निगरानी करेगा।

वहीं इस घटना ने बंगाल चुनाव की तपिश और बढ़ा दी है। बीजेपी नेता सुकांत मजूमदार ने कहा कि यह ममता बनर्जी के उकसावे वाले बयानों का नतीजा है। उन्होंने इसे वामपंथ के दौर की 'अनीता दीवान' जैसी जघन्य साजिश से जोड़ा, जिन्हें पीट-पीटकर मार दिया गया था। दूसरी तरफ घटना का बचाव करते हुए टीएमसी के कुणाल घोष ने इसे चुनाव आयोग की विफलता बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी कुछ संगठनों को स्पॉन्सर करके जनता को उकसा रही है ताकि अराजकता फैलाई जा सके।

देखा जाए तो आज सवाल केवल मालदा का नहीं है, सवाल उन 7 न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा का है जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अपनी ड्यूटी कर रहे थे। अगर एक राज्य का डीजीपी और मुख्य सचिव, चीफ जस्टिस के फोन के बाद भी घंटों तक एक्शन नहीं लेते, तो क्या यह माना जाए कि वहां संविधान नहीं, बल्कि किसी और का हुक्म चलता है?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न्यायपालिका को डराने की कोशिश करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। अब सबकी नजरें अगली सुनवाई पर हैं, जहाँ बंगाल के बड़े अफसरों को वर्चुअली पेश होकर अपनी 'बेरुखी' का हिसाब देना होगा। क्या बंगाल चुनाव की रंजिश में अब जजों को भी निशाना बनाया जाएगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब पूरे देश को चाहिए।

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