क्या बदलता मौसम छीन लेगा आम की मिठास?
भारत में आम सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि परंपरा, स्वाद और किसानों की आजीविका का अहम आधार है। दुनिया में सबसे ज्यादा आम पैदा करने वाला देश होने के बावजूद अब इसकी खेती पहले जैसी आसान नहीं रही। बदलते मौसम, बढ़ती लागत और अनिश्चित पैदावार ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।
पहले मौसम का एक तय चक्र होता था, लेकिन अब कभी समय से पहले बौर आ जाते हैं तो कभी ठंड या बारिश का पैटर्न बिगड़ जाता है। तेज हवाएं फल गिरा देती हैं और असामान्य तापमान से उत्पादन घट जाता है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है। आम की खेती तापमान, नमी और प्राकृतिक संतुलन पर बहुत निर्भर करती है, इसलिए जलवायु परिवर्तन इसे सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है।
भारत में लगभग 700 किस्मों के आम उगाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश का दशहरी, महाराष्ट्र का अल्फांसो और बिहार-पश्चिम बंगाल का लंगड़ा काफी लोकप्रिय हैं। लेकिन अब हर क्षेत्र में मौसम का असर दिखाई दे रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में थोड़ा सा बदलाव भी फसल को प्रभावित कर सकता है।
नई किस्में विकसित की जा रही हैं जो बदलते तापमान और कीट-रोगों का सामना कर सकें। हालांकि आम का पेड़ नई नस्ल के बाद कई सालों में फल देता है, इसलिए यह प्रक्रिया धीमी है। जीनोम की जानकारी मिलने से अब वैज्ञानिक मिठास, रंग, सुगंध और रोग प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े गुणों को बेहतर ढंग से समझ पा रहे हैं।
किसान भी नई तकनीक अपना रहे हैं। कुछ किसान ऐसी किस्में लगा रहे हैं जो हर साल फल दें। बैगिंग तकनीक से फलों को कीट और धूप से बचाया जाता है। गर्डलिंग से पेड़ की ऊर्जा फल बनने में लगती है। पुराने बागों की छंटाई करके उन्हें फिर से उत्पादक बनाया जा रहा है।
अब ग्रीनहाउस और संरक्षित खेती की ओर भी रुझान बढ़ रहा है, जिससे तापमान नियंत्रित रखा जा सके। निर्यात करने वाले व्यापारियों के लिए कीट नियंत्रण बेहद जरूरी है, क्योंकि विदेशों में गुणवत्ता के सख्त नियम होते हैं।
कुल मिलाकर, आम की खेती अब केवल पारंपरिक अनुभव पर नहीं चल सकती। इसमें विज्ञान, नई तकनीक और जलवायु के अनुसार रणनीति अपनाना जरूरी हो गया है। अगर किसान और वैज्ञानिक मिलकर नवाचार जारी रखें, तो भारत भविष्य में भी आम के उत्पादन में अग्रणी बना रह सकता है।
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