UP में फिर लौटेगा 2007 वाला खेल? मायावती का सबसे बड़ा दांव!

बात होगी उत्तर प्रदेश के उस सियासी चक्रव्यूह की, जिसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक के दिग्गजों की नींद उड़ा दी है! यूपी की राजनीति में एक बार फिर वो शेरनी लौट आई है, जिसने 2007 में अपने सोशल इंजीनियरिंग के दम पर पूरे देश को हिला कर रख दिया था! जी हां, हम बात कर रहे हैं बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो और यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की! 20 साल पुराना वही अंदाज...वही तेवर...और वही अचूक फॉर्मूला! जब अखिलेश का PDA और राहुल गांधी का संविधान वाला दांव चारों तरफ गूंज रहा है, ठीक उसी वक्त मायावती ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेल दिया है कि विरोधियों के खेमे में खलबली मच गई है! मायावती फिर से अपने सबसे कामयाब नुस्खे....दलित-ब्राह्मण गठजोड़ को मैदान में उतारने जा रही हैं! ऐसे में सवाल है कि क्या मायावती इतिहास दोहरा पाएंगी? क्या 2026 के इस दौर में फिर चलेगा हाथी और शंख का वो जादुई मेल? आइए जानते हैं इस महा-सियासी ड्रामे की इनसाइड स्टोरी!

उत्तर प्रदेश की सियासत में शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने जो कमाल दिखाया, उसके बाद से सभी की नजरें पिछड़े और दलित वोटर्स पर टिकी थीं। लेकिन बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने लीक से हटकर एक बार फिर सवर्णों, खासकर ब्राह्मण समाज को साधने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। याद करिए साल 2007! जब यूपी में 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है' के नारे गूंजते थे। उस वक्त दलित और ब्राह्मण वोटर्स ने मिलकर मायावती को पूर्ण बहुमत की सरकार सौंपी थी। उसके बाद मायावती ने कई और प्रयोग किए। जैसे कभी दलित-मुस्लिम गठजोड़ आजमाया तो कभी 2019 के आम चुनाव में लखनऊ के गेस्ट हाउस कांड की दुश्मनी को भुलाकर अखिलेश यादव से हाथ मिलाया। गठबंधन से फायदा तो हुआ, बीएसपी जो 2014 में जीरो पर सिमट गई थी, उसके 2019 में 10 सांसद चुनकर आए। लेकिन चुनाव के तुरंत बाद वो गठबंधन टूट गया। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी को तगड़ा झटका लगा और पार्टी महज 1 सीट पर सिमट कर रह गई। अब मायावती समझ चुकी हैं कि उनका असली और सबसे कारगर नुस्खा कौन सा है। 

आपको बता दें 2019 का गठबंधन क्या टूटा, समाजवादी पार्टी अब मायावती के निशाने पर सबसे ऊपर आ चुकी है। सोशल मीडिया पर मायावती ने सीधे-सीधे अखिलेश यादव की पार्टी पर हमला बोलते हुए लिखा है कि जब से बीएसपी ने ब्राह्मणों को प्राथमिकता देना शुरू किया है, समाजवादी पार्टी में उनकी नींद उड़ा देने वाली बेचैनी देखने को मिल रही है। मायावती ने पूरे भरोसे के साथ दावा किया है कि इस बार भी साल 2007 की तरह ब्राह्मण समाज के योगदान से बीएसपी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी और आगामी चुनाव में इतिहास खुद को रिपीट करेगा। इतना ही नहीं मायावती ने बड़ा चुनावी वादा करते हुए कहा कि सरकार बनते ही ब्राह्मणों को उनका पुराना गौरव और सम्मान वापस मिलेगा। इसके साथ ही क्षत्रिय, वैश्य और अन्य सवर्ण समाजों को भी बीएसपी से जोड़ने के लिए 'जिसकी जितनी तैयारी, उसकी उतनी भागीदारी' के तहत टिकट देने का काम लगातार जारी है।

आपको बता दें यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने की ये लड़ाई आज की नहीं है। 2022 के चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी के नेताओं में भगवान परशुराम की भव्य मूर्ति बनवाने की मानो एक होड़ सी लग गई थी। उस वक्त भी मायावती ने करारा तंज कसते हुए कहा था कि अगर सपा को सच में परशुराम जी की फिक्र थी, तो अपने शासनकाल में मूर्ति क्यों नहीं लगवाई? जनवरी 2026 में मायावती ने अपने जन्मदिन पर यूपी के लोगों को याद दिलाया कि उनकी सरकार में ब्राह्मण समाज को कितनी अहमियत और प्रतिनिधित्व मिलता था, जबकि मौजूदा बीजेपी राज में उनकी उपेक्षा हो रही है। वहीं मई 2026 में लखनऊ में एक युवा ब्राह्मण बीजेपी नेता पर जानलेवा हमला हुआ। मायावती ने तुरंत इस मुद्दे को लपकते हुए कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए और कहा कि यूपी में ब्राह्मण सिर्फ उपेक्षित ही नहीं, बल्कि पूरी तरह असुरक्षित हैं। वहीं इससे पहले 2025 में लखनऊ में बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की एक गुप्त बैठक को लेकर इतना बवाल मचा था कि यूपी बीजेपी अध्यक्ष को कड़ी हिदायत जारी करनी पड़ी थी कि अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। वहीं हाल ही में राहुल गांधी के जन्मदिन पर बनारस में यूथ कांग्रेस ने एक गजब का पोस्टर जारी किया। पोस्टर में राहुल गांधी के एक हाथ में संविधान की कॉपी थी और दूसरे हाथ में भगवान परशुराम का फरसा! यह साफ तौर पर ब्राह्मण समुदाय को अपनी तरफ खींचने का एक बड़ा राजनीतिक पैंतरा था।

कुल मिलाकर इस समय उत्तर प्रदेश का सियासी रण बेहद दिलचस्प हो चुका है। जहां एक तरफ अखिलेश यादव अपने सफल PDA फॉर्मूले को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, राहुल गांधी देश भर में जाति जनगणना कराने और ओबीसी को उनका हक दिलाने की हुंकार भर रहे हैं, और बीजेपी भी पूरा जोर पिछड़े वोटर्स को साधने में लगा रही है...वहीं मायावती ने इन सब से हटकर अपना पुराना और सबसे भरोसेमंद 'दलित ब्राह्मण' का गठजोड़ मैदान में उतार दिया है। देखा जाए तो आज के दौर में 2007 की सफलता को दोबारा दोहराना नामुमकिन सा लगता है, लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है और यूपी की सियासत में कब कौन सा पासा पलट जाए, यह कोई नहीं जानता! फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऊँट अब किस करवट बैठेगा, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा। क्या ब्राह्मण समाज बीजेपी, सपा और कांग्रेस के वादों को छोड़कर एक बार फिर मायावती के सर्वजन वाले नारे पर भरोसा करेगा? क्या हाथी और शंख की जुगलबंदी लखनऊ के सिंहासन तक का रास्ता तय कर पाएगी? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन एक बात तय है कि मायावती के इस नए दांव ने यूपी के आगामी चुनावों को बेहद दिलचस्प और कांटे का मुकाबला बना दिया है।

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