मीना कुमारी – अभिनय से कविता तक का सफर
भारतीय सिनेमा की इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो अपने अभिनय से दिलों को छू जाते हैं और आज भी याद किए जाते हैं। उनमें से एक नाम है मीना कुमारी का, जिन्हें ‘ट्रैजेडी क्वीन’ के तौर पर जाना जाता है। लेकिन मीना कुमारी सिर्फ़ एक महान अभिनेत्री ही नहीं थीं, वे एक प्रतिभाशाली कवयित्री भी थीं, जिनकी कविताएं उनकी भावनाओं और जीवन की पीड़ा का आईना हैं। मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त 1933 को मुंबई में हुआ था। उनका असली नाम मुमताज़ बानो था। बचपन से ही वे कला और अभिनय में रुचि रखती थीं। 1940 और 1950 के दशक में उन्होंने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय के साथ-साथ मीना कुमारी की एक अलग पहचान उनकी कविताओं के कारण भी है। वे अपनी कविताओं में जीवन की तन्हाई, प्रेम की पीड़ा और अंदरूनी जज़्बातों को बड़ी खूबसूरती से पिरोती थीं। उनकी प्रसिद्ध कविता संग्रह “मैं अपनी सी, मेरी सी” आज भी हिंदी साहित्य प्रेमियों के बीच लोकप्रिय है।
चांद तन्हा है आसमां तन्हा
दिल मिला है कहां कहां तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआं तन्हा
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हा है और जां तन्हा
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी
दोनों चलते रहें कहां तन्हा
जलती बुझती सी रौशनी के पर,
सिमटा सिमटा सा एक मकां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
आगाज़ तॊ होता है अंजाम नहीं होता
जब मेरी कहानी में वो नाम नहीं होता
जब ज़ुल्फ़ की कालिख़ में घुल जाए कोई राही
बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता
हंस हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकड़े
हर शख़्स की क़िस्मत में ईनाम नहीं होता
बहते हुए आंसू ने आंखों से कहा थम कर
जो मय से पिघल जाए वो जाम नहीं होता
दिन डूबे हैं या डूबे बारात लिये क़श्ती
यूं तेरी रहगुज़र से दीवानावार गुज़रे
काँधे पे अपने रख के अपना मज़ार गुज़रे
बैठे हैं रास्ते में दिल का खंडहर सजा कर
शायद इसी तरफ़ से एक दिन बहार गुज़रे
बहती हुई ये नदिया घुलते हुए किनारे
कोई तो पार उतरे कोई तो पार गुज़रे
ये रात ये तन्हाई
ये दिल के धड़कनों की आवाज़
ये सन्नाटा
ये डूबते तारों की
ख़ामोश गज़ल ख़्वानी
ये वक़्त की पलकों पर
सोती हुई वीरानी
जज़्बात-ए-मुहब्बत की
ये आख़िरी अंगड़ाई
बजाती हुई हर जानिब
ये मौत की शहनाई
सब तुम को बुलाते हैं
पल भर को तुम आ जाओ
बंद होती मेरी आंखों में
मुहब्बत का
एक ख़्वाब सजा जाओ


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